
धनंजय प्रताप सिंह, नईदुनिया, भोपाल। स्वच्छता के मामले में देश में सिरमौर इंदौर शहर में दूषित पानी से 20 लोगों की मौत ने सरकारी बदइंतजामी की तरफ देशभर का ध्यान खींचा। इससे सबक लेकर हर शहर अपनी जलापूर्ति के इंतजामों को गंभीरता से टटोल रहे हैं, लेकिन विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस फिर कमजोर साबित हुई है। जिस संवेदनशील मुद्दे पर नागरिकों के आक्रोश का रुख सरकार के मंत्री, महापौर से लेकर पार्षद तक की ओर बना रहा, उसे जनता की आवाज के रूप में कांग्रेस आगे नहीं बढ़ा सकी। इंटरनेट मीडिया पर प्रतिक्रिया में विरोध दर्ज कराने के बाद हाईकमान ने भी इस घटना की निंदा की, जिसे देखते हुए प्रदेश के दिग्गजों ने भी काफी अंतराल पर विरोध प्रकट किया, लेकिन कांग्रेस इस मुद्दे को जनता की पहल के साथ आगे बढ़ाने में असफल ही रही।
विरोध, प्रदर्शन और हंगामा के लिए कांग्रेस इंदौर में ही सिमट गई, जबकि यह मुद्दा पूरे प्रदेश को प्रभावित करता है, तो प्रदेशव्यापी अभियान कमजोर पड़ रही कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हो सकती थी। इंदौर में दूषित जल की आपूर्ति का मामला यूं ही अचानक सामने नहीं आया, बल्कि लंबे समय से की गई शिकायत की अनदेखी का यह दुष्परिणाम बना। मौत के बढ़ते आंकड़ों के बीच व्यवस्था के जिम्मेदारों के बयान खुद के बचाव और दूसरों पर आरोप के रूप में सामने आए, यानी खामी सरकारी व्यवस्था में ही थी, न कि अकस्मात हुई घटना का यह परिणाम था।
इंटरनेट मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने स्पष्ट कर दिया कि भागीरथपुरा के नागरिकों का आक्रोश जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के खिलाफ स्पष्ट रूप से उबाल पर था। लोकतंत्र में यह आक्रोश एक मजबूत नेतृत्व की तलाश करता है, जो आमतौर पर विपक्ष की तरफ जाकर ही पूरी होती है, लेकिन दूषित जल के मामले में जब इंदौर सहित पूरा प्रदेश आवाज उठाने के लिए नेतृत्व की तलाश कर रहा था, तो कांग्रेस ने नागरिकों का साथ देने की बजाय अपने पारंपरिक तरीके के विरोध, प्रदर्शन में ही खुद का चेहरा चमकाने का रास्ता चुन लिया। तुलनात्मक रूप से देखें तो विपक्ष की भूमिका में भाजपा ऐसे मामलों में सांगठनिक रूप से एकजुट होकर प्रदेश की सीमाओं को भी पार कर जाती थी। भाजपा सड़क पर बड़े आंदोलनों के अलावा बयानों से हमलावर होकर सरकार को कठघरे में खड़ा कर देती थी।
ऐसे कई मामले हुए जिसे भाजपा ने सड़क पर दमदार तरीके से उठाया और सदन में सरकार की जबरदस्त घेराबंदी की। कांग्रेस विधानसभा के सदन में भी कमजोर प्रदर्शन के चलते भाजपा सरकार को पूरी सहूलियत देती दिखाई दे रही है। इंदौर के प्रदूषित जल के मामले में जब कांग्रेस को एकजुट होकर सरकार पर बड़ी कार्रवाई के लिए दबाव बनाना था, तब वह दो अलग-अलग यात्राओं को लेकर खुद विवाद में आ गई। एक यात्रा का नेतृत्व प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी कर रहे, तो दूसरी की कमान दिग्विजय सिंह के हाथ है। ऐसे में सरकार से जनता की नाराजगी को आवाज देने वाली कार्यकर्ताओं की मनोदशा समझी जा सकती है।
इंदौर का यह मामला कांग्रेस के लिए इस लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण था कि अगले तीन साल मध्य प्रदेश में चुनावों का सिलसिला जारी रहेगा। 2027 में स्थानीय निकाय के चुनाव होंगे, वहीं 2028 में विधानसभा चुनाव और 2029 में लोकसभा चुनाव होने हैं। मोहन सरकार के दो साल में सरकार की सफलता के मुकाबले कांग्रेस की बतौर विपक्ष बेहतर भूमिका सामने नहीं आई है। अब जो समय बचा है, उसमें कांग्रेस को संगठन मजबूत करना है और भाजपा सरकार को घेरकर अपने लगभग ढाई दशक के वनवास को भी दूर करना है।
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कांग्रेस ने विगत माह में सदस्यता अभियान के लिए काफी जोर आजमाइश की, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि महंगाई, अपराध, बेरोजगारी जैसे मुद्दे राजनीति में हाशिए पर जा चुके हैं, तो जनहित के मुद्दों को ही मुखरता से उठाना अब विपक्ष के लिए एकमात्र रास्ता है। मुश्किल यह है कि कांग्रेस इसमें भी असफल रही है। कांग्रेस अब भी जनता की नब्ज नहीं पहचान पा रही है।