
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर: भागीरथपुरा दूषित जल कांड के बाद प्रशासनिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा पूरी तरह डगमगा गया है। मंगलवार को यह अविश्वास भागीरथपुरा की गलियों से लेकर हाई कोर्ट तक साफ दिखाई दिया। नगर निगम ने क्षेत्र में जलापूर्ति तो की लेकिन डर और संदेह के कारण लोग पानी पीने को तैयार नहीं हैं। इधर, हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी यही अविश्वास झलका।
याचिकाकर्ताओं ने साफ शब्दों में कहा कि प्रशासन द्वारा गठित कमेटी पर उन्हें भरोसा नहीं है। वहीं, जल सुनवाई में भी अब लोगों को रुचि नहीं रही। इसका प्रमाण है कि मंगलवार को पिछली बार (309) की तुलना में इससे काफी कम (100 से भी कम) लोग पहुंचे। बता दें, भागीरथपुरा में दूषित जल से मौत का पहला मामला 21 दिसंबर, 2025 को सामने आया था। तब से अब तक 24 लोगों की जान चली गई, लेकिन व्यवस्था बहाल नहीं हुई है।
इस मामले को लेकर हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में चल रही पांच अलग-अलग जनहित याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई हुई। मुख्य सचिव अनुराग जैन वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए। उन्होंने बताया कि उच्च स्तरीय कमेटी बना दी गई है, जो जांच कर रही है। इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्हें कमेटी पर भरोसा नहीं है।
उनके वकील अजय बागड़िया ने कहा कि आठ फरवरी, 2023 को भागीरथपुरा में दूषित पानी की शिकायत के बाद लाइन बदलने का टेंडर हुआ था। काम एक साल में पूरा होना था, लेकिन 24 मौत के बाद निगम ने जो रिपोर्ट पेश की है, वह बता रही है कि 80 प्रतिशत काम ही अब तक पूरा हुआ है।
उन्होंने कहा कि इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि काम में हुई देरी पर जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई हुई। अगर 80 प्रतिशत काम पूरा हो गया था, तो फिर पीने के पानी में मल-मूत्र कैसे मिला। इसकी कोई जांच नहीं हुई। जिन निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव को हादसे के बाद ट्रांसफर किया गया था, उन्हें अब पर्यटन विभाग में एमडी बना दिया गया है। जिन अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग उठ रही है, उन्हें अच्छे पदों पर बैठाया जा रहा है।
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कोर्ट ने मुख्य सचिव से पूछा कि हमारे आदेशों के पालन की निगरानी की क्या व्यवस्था है? मुख्य सचिव बोले तीन स्तर पर निगरानी हो रही है। कोर्ट ने कहा कि हम आपराधिक कार्रवाई के बारे में भी विचार करेंगे, लेकिन पहले नागरिकों के लिए स्वच्छ जल और निश्शुल्क उपचार की व्यवस्था जरूरी है।
इसके बाद याचिकाकर्ता के वकीलों ने मांग की कि हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में कमेटी गठित कर जांच करवाई जाए। लगभग डेढ़ घंटे सुनवाई के बाद कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया।