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नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी से पहली मौत हुए एक माह बीत चुका है, स्थिति अब भी पूरी तरह से सामान्य नहीं हुई है। हालत यह है कि जनता को न निगम द्वारा वितरित किए जा रहे पानी पर भरोसा हो रहा है, न वकीलों को प्रशासन द्वारा गठित जांच समिति पर। हादसे को लेकर हाई कोर्ट में चल रही पांच अलग-अलग जनहित याचिकाओं में मंगलवार को एक साथ सुनवाई हुई। मुख्य सचिव अनुराग जैन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए। उन्होंने बताया कि मामले में उच्च स्तरीय कमेटी बना दी गई है जो जांच कर रही है। इस पर याचिकाकर्ता ने स्पष्ट कहा कि उन्हें कमेटी पर भरोसा नहीं है।
कोर्ट के पूछने पर उन्होंने एक-एक ऐसे कारण गिनाए कि अधिकारी कुछ बोल ही नहीं सके। वकीलों ने मांग की कि हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित कर भागीरथपुरा मामले की जांच करवाई जाए, ताकि लापरवाही सामने आ सके। लगभग डेढ़ घंटे सुनवाई के बाद कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया। मंगलवार दोपहर करीब ढाई बजे मामले में सुनवाई शुरू हुई। मुख्य सचिव ने जैसे ही कोर्ट को बताया कि कमेटी बना दी है, याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने कहा कि हादसे को 20 दिन से ज्यादा हो गए हैं, अब तक कुछ नहीं हुआ। जिन निगमायुक्त को हादसे के बाद ट्रांसफर किया गया था, उन्हें अब पर्यटन विभाग में एमडी बना दिया गया है। जिन अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग उठ रही है, उन्हें अच्छे पदों पर बैठाया जा रहा है। सरकार ने एक भी जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।
कोर्ट ने मुख्य सचिव से पूछा कि हमारे आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं। जब मुख्य सचिव ने कहा कि पालन हो रहा है, क्षेत्र में साफ पानी और निःशुल्क उपचार की सुविधा उपलब्ध करवा दी है, तब कोर्ट ने पूछा कि आदेशों के पालन की निगरानी की क्या व्यवस्था है। मुख्य सचिव बोले तीन स्तर पर निगरानी हो रही है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बार-बार इस बात को लेकर चिंता जताई कि आदेशों के पालन में जो कुछ हो रहा है उसकी निगरानी की कोई व्यवस्था है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि हम आपराधिक कार्रवाई के बारे में भी विचार करेंगे, लेकिन पहले नागरिकों के लिए स्वच्छ जल और निःशुल्क उपचार की व्यवस्था जरूरी है।
सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया कि शौचालय से पीने का पानी दूषित हुआ था, इसे बंद कर दिया गया है। इस पर कोर्ट ने पूछा कि आपने यह कैसे मान लिया कि इसी शौचालय से पानी दूषित हुआ? क्या इस बारे में कोई रिपोर्ट पेश की है? इस पर सरकारी वकील कुछ नहीं बोल सके। वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने कहा कि जांच समिति पर विश्वास नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसकी वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि 8 फरवरी 2023 को भागीरथपुरा में दूषित पानी की शिकायत के बाद लाइन बदलने का टेंडर हुआ था। काम एक साल में पूरा होना था, लेकिन मौत के बाद निगम ने जो रिपोर्ट पेश की है वह बता रही है कि 80 प्रतिशत काम ही अब तक पूरा हुआ है।
इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि काम में हुई देरी पर जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई हुई। यह भी सोचने वाली बात है कि अगर 80 प्रतिशत काम पूरा हो गया था तो फिर पीने के पानी में मल-मूत्र कैसे मिला, इसकी कोई जांच नहीं हुई। जिम्मेदारों पर एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2017-18 की रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश की और कहा कि अधिकारियों को पता था कि भागीरथपुरा में दूषित पानी आ रहा है, बावजूद इसके कोई कार्रवाई नहीं की गई। मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया, सुनील जैन, विभोर खंडेलवाल, रितेश इनानी, अनिल ओझा, मनीष यादव, प्रियेश भावसार, राहुल सेठी, मोहनसिंह चंदेल आदि ने पैरवी की।
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