
अरविंद दुबे, नईदुनिया, इंदौर। करीब 91 साल पहले महात्मा गांधी इंदौर आए थे। यहां इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री में उन्होंने खेतों और जैविक अपशिष्ट से खाद बनाने की प्रक्रिया देखी। इंदौर में विकसित इस कंपोस्ट पद्धति को आगे चलकर ‘इंदौर मेथड’ के नाम से पहचान मिली। यह प्रयोग गांधी को इतना महत्वपूर्ण लगा कि उन्होंने बाद में अपने ग्राम स्वराज संबंधी लेखन में इसका उल्लेख किया।
उस दौर में विचार सीधा था- जिसे कचरा समझकर फेंक दिया जाता है, उसे खेत के लिए उपयोगी खाद में बदला जा सकता है। जैविक कचरे, गोबर, राख और दूसरे पदार्थों को निर्धारित प्रक्रिया से गड्ढों में डालकर कंपोस्ट तैयार की जाती थी। आज वही विचार इंदौर में तकनीक और बड़े पैमाने के साथ दिखाई देता है।
घरों और बाजारों से निकलने वाले गीले कचरे को अलग एकत्र कर उसका प्रसंस्करण किया जाता है। इससे जैविक खाद तैयार होने के साथ बड़े संयंत्र में बायो-सीएनजी भी बनाई जा रही है। देवगुराड़िया स्थित बायो-सीएनजी प्लांट में प्रतिदिन 550 टन गीले कचरे के प्रसंस्करण की क्षमता है। यहां जैविक कचरे से बायो-सीएनजी के साथ जैविक खाद भी तैयार की जाती है।
1935 में जहां कचरे को खाद में बदलने का प्रयोग था, आज उसी सोच ने कचरे को खाद से आगे ऊर्जा के स्रोत में बदल दिया है। तकनीक बदली, शहर बढ़ा, लेकिन सोच वही रही कि बेकार दिखने वाली चीज में उपयोगिता तलाशना। गांधी ने जिस प्रयोग में संभावना देखी थी, आज वही विचार इंदौर की कचरा प्रबंधन व्यवस्था में नए रूप में दिखाई दे रहा है।
1918 में महात्मा गांधी पहली बार इंदौर आए थे। बिस्को पार्क (वर्तमान नेहरू पार्क) में अष्टम हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान लगे शामियाने में गांधीजी के साथ महामना मदन मोहन मालवीय, सर सेठ हुकुमचंद और इंदौर के अन्य गणमान्य व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं। इसी सम्मेलन में गांधीजी ने करीब 15 हजार लोगों को संबोधित करते हुए हिंदी के प्रचार-प्रसार का आह्वान किया था।
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1918 में महात्मा गांधी पहली बार इंदौर आए थे। बिस्को पार्क (वर्तमान नेहरू पार्क) में अष्टम हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान लगे शामियाने में गांधीजी के साथ महामना मदन मोहन मालवीय, सर सेठ हुकुमचंद और इंदौर के अन्य गणमान्य व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं। इसी सम्मेलन में गांधीजी ने करीब 15 हजार लोगों को संबोधित करते हुए हिंदी के प्रचार-प्रसार का आह्वान किया था।
1935 में गांधी का दूसरा इंदौर दौरा हुआ। इंद्र भवन की पहली मंजिल के चौक में फर्श पर बैठे गांधीजी को चांदी की थाली और गिलास में भोजन कराया गया। साथ में सर सेठ हुकुमचंद और परिवार की महिलाएं दिखाई दे रही हैं। भोजन के बाद सेठ हुकुमचंद ने यही चांदी के बर्तन गांधीजी को भेंट किए थे, जिन्हें गांधीजी ने बाद में हरिजन उत्थान के लिए नीलाम कर दिया।