• Jagran.com
  • Jagran Josh
  • Her Zindagi
  • Onlymyhealth
  • Jagran TV
  • Vishvas News
  • Inextlive
मेरी खबरें
  • होम
  • ताजा खबरें
  • मध्यप्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • उत्तर प्रदेश
  • देश
  • धर्म
  • मनोरंजन
  • राशिफल
  • लाइफस्टाइल
  • अन्य
    • बिज़नेस
    • बड़ी खबरें
    • खेल
    • विदेश
    • करियर
    • टॉपिक्स
    • टेक्नोलॉजी
    • शिक्षा
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • राशिफल
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • फटाफट
  • राशिफल
  • वेब स्टोरीज
नईदुनिया ट्रेंडिंग
  • बढ़ता यूपी
  • समृद्ध उत्तराखंड
  • Mutual Funds मास्टरी
  • होम
  • मध्य प्रदेश
  • इंदौर

Gandhi Jayanti: महात्मा गांधी ने इंदौर में बनते देखी थी खाद, आज भी कचरे से बन रहा ईंधन

इंदौर में देवगुराड़िया स्थित बायो-सीएनजी प्लांट में प्रतिदिन 550 टन गीले कचरे के प्रसंस्करण की क्षमता है। यहां जैविक कचरे से बायो-सीएनजी के साथ जैविक ...और पढ़ें

By Arvind dubeyEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Fri, 02 Oct 2026 08:11:25 AM (IST)Updated Date: Fri, 02 Oct 2026 08:40:22 AM (IST)
Gandhi Jayanti: महात्मा गांधी ने इंदौर में बनते देखी थी खाद, आज भी कचरे से बन रहा ईंधन
1935 में गांधी का दूसरा इंदौर दौरा हुआ। इंद्र भवन की पहली मंजिल के चौक में फर्श पर बैठे गांधीजी को चांदी की थाली और गिलास में भोजन कराया गया। साथ में सर सेठ हुकुमचंद और परिवार की महिलाएं दिखाई दे रही हैं। भोजन के बाद सेठ हुकुमचंद ने यही चांदी के बर्तन गांधीजी को भेंट किए थे, जिन्हें गांधीजी ने बाद में हरिजन उत्थान के लिए नीलाम कर दिया। सौजन्य: दुर्लभ चित्र एवं जानकारी जफर अंसारी म्यूजियम ऑफ इंदौर।

HighLights

  1. ग्राम स्वराज संबंधी लेखन में बापू ने किया था इंदौर के नवाचार का उल्लेख
  2. 1935 में इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री में देखा था जैविक अपशिष्ट से खाद बनाने का प्रयोग
  3. 91 साल बाद उसी सोच को इंदौर शहर ने बड़े पैमाने पर अपनाया

अरविंद दुबे, नईदुनिया, इंदौर। करीब 91 साल पहले महात्मा गांधी इंदौर आए थे। यहां इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री में उन्होंने खेतों और जैविक अपशिष्ट से खाद बनाने की प्रक्रिया देखी। इंदौर में विकसित इस कंपोस्ट पद्धति को आगे चलकर ‘इंदौर मेथड’ के नाम से पहचान मिली। यह प्रयोग गांधी को इतना महत्वपूर्ण लगा कि उन्होंने बाद में अपने ग्राम स्वराज संबंधी लेखन में इसका उल्लेख किया।

उस दौर में विचार सीधा था- जिसे कचरा समझकर फेंक दिया जाता है, उसे खेत के लिए उपयोगी खाद में बदला जा सकता है। जैविक कचरे, गोबर, राख और दूसरे पदार्थों को निर्धारित प्रक्रिया से गड्ढों में डालकर कंपोस्ट तैयार की जाती थी। आज वही विचार इंदौर में तकनीक और बड़े पैमाने के साथ दिखाई देता है।


घरों और बाजारों से निकलने वाले गीले कचरे को अलग एकत्र कर उसका प्रसंस्करण किया जाता है। इससे जैविक खाद तैयार होने के साथ बड़े संयंत्र में बायो-सीएनजी भी बनाई जा रही है। देवगुराड़िया स्थित बायो-सीएनजी प्लांट में प्रतिदिन 550 टन गीले कचरे के प्रसंस्करण की क्षमता है। यहां जैविक कचरे से बायो-सीएनजी के साथ जैविक खाद भी तैयार की जाती है।

1935 में जहां कचरे को खाद में बदलने का प्रयोग था, आज उसी सोच ने कचरे को खाद से आगे ऊर्जा के स्रोत में बदल दिया है। तकनीक बदली, शहर बढ़ा, लेकिन सोच वही रही कि बेकार दिखने वाली चीज में उपयोगिता तलाशना। गांधी ने जिस प्रयोग में संभावना देखी थी, आज वही विचार इंदौर की कचरा प्रबंधन व्यवस्था में नए रूप में दिखाई दे रहा है।

naidunia_image

1918 में महात्मा गांधी पहली बार इंदौर आए थे। बिस्को पार्क (वर्तमान नेहरू पार्क) में अष्टम हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान लगे शामियाने में गांधीजी के साथ महामना मदन मोहन मालवीय, सर सेठ हुकुमचंद और इंदौर के अन्य गणमान्य व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं। इसी सम्मेलन में गांधीजी ने करीब 15 हजार लोगों को संबोधित करते हुए हिंदी के प्रचार-प्रसार का आह्वान किया था।

यह भी पढ़ें- 2 अक्टूबर को सिर्फ गांधी-शास्त्री जयंती ही नहीं, ये 6 खास दिन भी मनाए जाते हैं; जानिए हर दिवस का क्या है मतलब

हिंदी से हरिजन सेवा तक... इंदौर में बापू के दो पड़ाव

1918 में महात्मा गांधी पहली बार इंदौर आए थे। बिस्को पार्क (वर्तमान नेहरू पार्क) में अष्टम हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान लगे शामियाने में गांधीजी के साथ महामना मदन मोहन मालवीय, सर सेठ हुकुमचंद और इंदौर के अन्य गणमान्य व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं। इसी सम्मेलन में गांधीजी ने करीब 15 हजार लोगों को संबोधित करते हुए हिंदी के प्रचार-प्रसार का आह्वान किया था।

1935 में गांधी का दूसरा इंदौर दौरा हुआ। इंद्र भवन की पहली मंजिल के चौक में फर्श पर बैठे गांधीजी को चांदी की थाली और गिलास में भोजन कराया गया। साथ में सर सेठ हुकुमचंद और परिवार की महिलाएं दिखाई दे रही हैं। भोजन के बाद सेठ हुकुमचंद ने यही चांदी के बर्तन गांधीजी को भेंट किए थे, जिन्हें गांधीजी ने बाद में हरिजन उत्थान के लिए नीलाम कर दिया।

यह भी पढ़ें- Gandhi Jayanti 2026: 2 अक्टूबर को ही क्यों मनाया जाता है 'अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस'? भारत ही नहीं, विदेश में भी इस दिन का खास महत्व