
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में दूषित जलापूर्ति की वजह से चार हजार से अधिक व्यक्तियों के बीमार पड़ने और इनमें से 24 की मौत की चर्चा पूरी दुनिया में है। अपनी स्वच्छता पर देशभर में इतराने वाले शहर में मल-मूत्र मिश्रित पेयजल आपूर्ति राष्ट्रीय शर्म बन गई है। सिर्फ यही नहीं एक और शर्मनाक वाकया भी हुआ है जिसकी अब तक बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई। भागीरथपुरा में जब बड़ी संख्या में उल्टी-दस्त के मरीज आने लगे तो उन्हें उपचार के लिए शहर के बड़े सरकारी अस्पतालों में भर्ती करवाया गया, लेकिन दो-तीन दिन में ही जिम्मेदारों का सरकारी अस्पतालों पर से विश्वास डगमगा गया।
वहां की व्यवस्था को देखकर उन्हें समझ आ गया कि सरकारी अस्पतालों पर भरोसा किया तो मौत का आंकड़ा कहीं ज्यादा पहुंच जाएगा। यही वजह रही कि गंभीर मरीजों को इंदौर के चार बड़े निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। गंभीर मरीज आज भी निजी अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। संकट की घड़ी में सरकारी अस्पतालों के बजाय निजी अस्पताल पर विश्वास जताकर प्रशासन ने सरकारी चिकित्सा सेवा की बदहाली को बेपर्दा कर दिया। प्रशासन भले ही कुछ भी कहे, लेकिन सचाई यही है कि एमवायएच और चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय की चिकित्सा और मरीजों की देखभाल व्यवस्था आज भी असंतोषजनक है।
खुद सरकार को ही अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा नहीं है। करोड़ों के बजट, चमकदार योजनाओं और बड़े-बड़े दावों के पीछे छिपी हकीकत यही है कि संकट की घड़ी में सरकारी सिस्टम जवाब दे जाता है। प्रदेश की आर्थिक राजधानी के नामी सरकारी अस्पतालों का का यह हाल है तो प्रदेश के अन्य सरकारी अस्पतालों की क्या हालत होगी। लगातार कम हो रहा सरकारी अस्पतालों पर जनता का विश्वास सरकारी अस्पतालों पर आमजन का विश्वास लगातार कम हो रहा है।
प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमवायएच में किसी समय शत प्रतिशत बिस्तर मरीजों से भरे रहते थे, लेकिन आज बेड आक्यूपेंसी 70 प्रतिशत तक पहुंच गई है और लगातार गिर रही है। यही स्थिति अन्य सरकारी अस्पतालों की भी है। सरकारी अस्पतालों में कर्मचारियों के दुर्व्यवहार को लेकर अक्सर शिकायतें आती रहती है। इसकी एक बड़ी वजह है कि सरकारी सिस्टम में इस निरंकुशता पर लगाम लगाने की कोई व्यवस्था है ही नहीं।
प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में सिटी स्कैन और एमआरआई जैसी जांच की व्यवस्था तक नहीं है। हालत यह है कि आवश्यकता पड़ने पर गंभीर मरीज को जांच के लिए अस्पताल से बाहर ले जाना पड़ता है। वास्तविकता यह है कि सरकारी अस्पतालों में जांच में लगी मशीनों के रखरखाव की कोई सुदृढ़ व्यवस्था ही नहीं है। वार्षिक रखरखाव का ठेका देने के बाद यह देखने वाला कोई नहीं है कि वास्तव में रखरखाव हो भी रहा है या नहीं। जबकि निजी अस्पतालों में मशीनों की गुणवत्ता के साथ-साथ कर्मचारियों के व्यवहार को लेकर कहीं ज्यादा सतर्कता बरती जाती है।
एमवायएच अस्पताल एमजीएम मेडिकल कालेज के अंतर्गत आता है। कालेज के 750 पीजी स्टूडेंट और 250 इंटर्न (एमबीबीएस पासआउट) एमवायएच में प्रैक्टिस करते हैं। कॉलेज में 300 से ज्यादा प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। एमवायएच में 700 से ज्यादा नर्सिंग स्टाफ और 300 से ज्यादा पैरा मेडिकल स्टूडेंट हैं। इन सबके बावजूद गंभीर मरीजों को निजी अस्पताल शिफ्ट करना पड़ रहा है। मरीजों के फीडबैक की कोई व्यवस्था ही नहीं निजी अस्पताल मरीज और उनके स्वजन से व्यवस्था को लेकर लगातार फीडबैक लेते रहते हैं ताकि व्यवस्थाओं में सुधार किया जा सके, लेकिन सरकारी अस्पतालों में ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है।
एमजीएम मेडिकल कालेज में डाक्टरों के वेतन पर ही प्रतिमाह 30 से 35 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। इसके अलावा दवाईयां, रखरखाव, सफाई इत्यादि खर्च अलग हैं। इन खर्चों को जोड़कर देखें तो एमवायएच में औसतन 30 से 35 लाख रुपये रोजाना का खर्चा होता है, बावजूद इसके गंभीर मरीजों को निजी अस्पताल शिफ्ट करना पड़ रहा है।
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उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद भागीरथपुरा के 50 से ज्यादा मरीजों को एमवायएच और चाचा नेहरू अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन जब इनमें से दो-तीन मरीजों की मौत हो गई तो प्रशासन के हाथ-पैर फुल गए। गंभीर मरीजों को इन अस्पतालों से निकालकर शहर के चार बड़ी निजी अस्पतालों में शिफ्ट किया गया।