नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट में सात अधिवक्ताओं को न्यायाधीश नियुक्त करने की सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की अनुशंसा के विरुद्ध दायर जनहित याचिका पर गुरुवार को सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर तीखी बहस हुई।
मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे व न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ के समक्ष दोनों पक्षों ने आधे घंटे से अधिक समय तक मौखिक तर्क रखे। सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने निर्णय सुरक्षित कर लिया। हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से अतिरिक्त तथ्य और लिखित तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति मांगे जाने पर युगलपीठ ने छह नवंबर तक लिखित पक्ष रखने की छूट दे दी।
ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका में न्यायपालिका में सामाजिक विविधता और एससी, एसटी व ओबीसी वर्गों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न प्रमुखता से उठाया गया। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में वर्तमान में करीब 95 प्रतिशत न्यायाधीश सवर्ण वर्ग से हैं।
आजादी के बाद से अब तक एसटी वर्ग का एक भी न्यायाधीश नियुक्त नहीं हुआ। सात प्रस्तावित नामों की सामाजिक संरचना पर सवाल उठाते हुए इसे संविधान की समतामूलक भावना के विपरीत बताया गया।
इंद्रा साहनी फैसले और ओबीसी आरक्षण का हवाला
बहस के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से इंद्रा साहनी विरुद्ध भारत संघ प्रकरण का हवाला दिया गया। तर्क रखा गया कि नौ न्यायाधीशों की पीठ में आठ न्यायाधीश सवर्ण वर्ग से थे और उसी फैसले में क्रीमीलेयर की अवधारणा सामने आई।
याचिकाकर्ताओं ने नौ अक्टूबर, 2026 के ओबीसी आरक्षण संबंधी निर्णय का भी उल्लेख करते हुए न्यायिक निर्णयों में सामाजिक दृष्टिकोण और प्रतिनिधित्व के सवाल उठाए। इस दौरान न्यायमूर्ति शील नागू के एक पूर्व फैसले का हवाला भी दिया गया, जिसमें ओबीसी और सामान्य वर्ग के कटऑफ अंकों के अंतर को न्यायसंगत ठहराया गया था।
एएजी की सामाजिक पहचान पर भी बहस
सुनवाई में विधि अधिकारियों की नियुक्तियों में कथित पक्षपात का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रशांत सिंह की नियुक्ति का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया गया कि प्रभावशाली पदों पर नियुक्तियों में जातिगत निकटता को प्राथमिकता मिलती है।
इस पर अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत रूपराह ने आपत्ति जताई और स्वयं को ओबीसी वर्ग से संबंधित बताया। याचिकाकर्ता पक्ष ने उनसे जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की बात कही। एसोसिएशन के प्रेस नोट के अनुसार, इस दौरान अधिवक्ता उदय कुमार ने नकली ओबीसी पहचान के जरिए वास्तविक पात्रों का हक प्रभावित होने का आरोप भी लगाया।
लाइव स्ट्रीमिंग बंद होने पर आपत्ति
एसोसिएशन के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर के अनुसार सुनवाई के दौरान लाइव स्ट्रीमिंग बंद कर दी गई और वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए जुड़ने के इच्छुक अधिवक्ताओं को भी बहस में शामिल नहीं किया गया।
याचिका में कॉलेजियम की अनुशंसा निरस्त करने, नियुक्तियों पर पुनर्विचार और हाई कोर्ट के स्वीकृत पदों में ओबीसी, एससी व एसटी वर्गों को 85 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की मांग की गई है।
अन्य राज्यों से इन वर्गों के न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा प्रतिनिधित्व के असंतुलन को दूर करने के सुझाव भी दिए गए हैं। कॉलेजियम ने डॉक्टर विवेक शरण, राजेश कुमार शुक्ला, कनक गहरवार, भक्ति व्यास, श्रेयस पंडित, मृणाल एलकर और अविनाश जरगर के नामों की अनुशंसा की है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह, परमानंद साहू, उदय कुमार सहित नौ अधिवक्ता पैरवी कर रहे हैं।