
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। अपात्र व्यक्तियों को नियम विरुद्ध अनुकंपा नियुक्तियां देने के मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवैध नियुक्तियों का लाभ लेने वाले कर्मचारियों को सेवा से हटा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे नियुक्तियों में भूमिका निभाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने विशेष पुलिस स्थापना को संबंधित कलेक्टर, तत्कालीन मुख्य चिकित्सा व स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ), नियुक्ति पाने वाले व्यक्तियों और अन्य संबंधित लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कर जांच करने के निर्देश दिए हैं।
जांच रिपोर्ट पेश का आदेश
वहीं, लोकायुक्त पुलिस को 30 दिन के भीतर प्रारंभिक जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने कहा है। यह मामला छिंदवाड़ा निवासी नितिन मालवी की ओर से वर्ष 2017 में दायर याचिका से संबंधित है। सुनवाई के दौरान शासन की ओर से बताया गया कि जिन लोगों को कथित रूप से अवैध तरीके से अनुकंपा नियुक्तियां दी गई थीं, उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं।
एकलपीठ ने सीएमएचओ छिंदवाड़ा द्वारा आठ अक्टूबर 2026 को जारी आदेश का अवलोकन किया। इसमें सुनील सेलुकर सहित तीन अन्य समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों की अनुकंपा नियुक्तियां निरस्त किए जाने की जानकारी दी गई थी। शासन ने यह भी बताया कि एक अन्य व्यक्ति को कलेक्टर छिंदवाड़ा ने नियुक्ति दी थी।
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कारण बताओ नोटिस जारी
संबंधित कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और आगे की कार्रवाई प्रस्तावित है। एकलपीठ ने माना कि जब सीएमएचओ और कलेक्टर के स्तर पर अपात्र व्यक्तियों को अनुकंपा नियुक्ति देने की प्रथमदृष्टया अनियमितता सामने आ रही है, तो केवल नियुक्तियां निरस्त करना पर्याप्त नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम में अधिकारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की आपराधिक जांच आवश्यक है। कोर्ट ने विशेष पुलिस स्थापना को संबंधित अधिकारियों, नियुक्तियों का लाभ लेने वालों और इस प्रक्रिया में भूमिका निभाने वाले अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध एफआइआर दर्ज कर जांच करने के निर्देश दिए।
आदेश की प्रति मध्य प्रदेश के लोकायुक्त को भी भेजने कहा गया है, ताकि दोषी अधिकारियों के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई की जा सके। मामले की अगली सुनवाई 15 दिसंबर को निर्धारित की गई है।
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