
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मेडिकल शिक्षकों की भर्ती से जुड़े एक विवादित मामले में राज्य सरकार के पक्ष को मजबूती दी है। मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने स्पष्ट किया है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के दायरे में रहते हुए संबंधित संस्थान या सरकार चयन के लिए उच्च योग्यता के मानक तय कर सकते हैं।
भोपाल की डॉ. सविता राठौर सहित 12 अन्य सहायक प्राध्यापकों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति मांगी थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने तर्क दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं को इस स्तर पर राहत दी जाती है, तो यह उन अन्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा जिनके पास समान योग्यता है, लेकिन विज्ञापन की शर्तों को देखते हुए उन्होंने आवेदन नहीं किया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की गई उच्च योग्यता एमसीआई के मूल मानकों से कहीं अधिक है। उनके अनुसार, इन कड़े मानकों के कारण कई योग्य और अनुभवी शिक्षक चयन प्रक्रिया की दौड़ से बाहर हो रहे हैं। याचिका में मांग की गई थी कि सरकार को एमसीआई के न्यूनतम मानकों का ही पालन करना चाहिए।
राज्य सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता नीलेश यादव ने जोरदार दलील दी। उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा एक संवेदनशील क्षेत्र है और इसकी गुणवत्ता बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार को यह वैधानिक अधिकार है कि वह मेडिकल कॉलेज में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एमसीआई द्वारा तय न्यूनतम योग्यता से ऊपर जाकर और भी बेहतर मानक निर्धारित करे।
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दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद युगलपीठ ने माना कि राज्य सरकार ने योग्यता के मानकों को कम नहीं किया है, बल्कि उन्हें और भी बेहतर (Superior) बनाया है। कोर्ट ने कहा कि न्यूनतम योग्यता से ऊपर जाना प्रथमदृष्ट्या नियमों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। इसी के साथ कोर्ट ने स्वास्थ्य एवं मेडिकल एजुकेशन विभाग के संचालक, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है।