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नईदुनिया प्रतिनिधि, श्योपुर। चीतों की देखरेख की सारी जिम्मेदारी कूनो प्रबंधन की है। इसके लिए 24 घंटे ट्रैकिंग टीमें तैनात किए जाने के दावे भी हैं, लेकिन चीता शावक के शिकार के बाद कार्रवाई सिर्फ सामान्य वन मंडल पर किए जाने से सवाल उठ रहे हैं।
इससे पहले भी कई चीतों की मौत संदिग्ध हालात में हुई है, परंतु न तो मौत के कारण की पड़ताल सामने आई है और न किसी को जिम्मेदार मानकर कार्रवाई की गई है। चौंकाने वाली बात शिकार से पहले भोपाल के वन्यजीव कार्यकर्ता ने आरटीआई (सूचना का अधिकार) के माध्यम से चीतों की मौत के लिए जिम्मेदारों पर कार्रवाई का ब्योरा मांगा था, इसके जवाब में भी इसे राष्ट्रीय महत्व के विषय से जोड़कर जानकारी देने से इन्कार कर दिया गया था।
कूनो पर खर्च हो रहे करोड़ों खर्च
चीता प्रोजेक्ट में चीतों की सुरक्षा और देखरेख के नाम पर मध्य प्रदेश के श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में करोड़ों रुपये का बजट खर्च हो रहा है। अधिकारियों-कर्मचारियों को देश-विदेश में विशेष प्रशिक्षण दिया गया। चीतों की हाईटेक व मानवीय निगरानी के दावे हैं।
इसके बावजूद चीता शावक का शिकार हो गया। घटना के बाद वन विभाग ने सामान्य वन मंडल के अमले पर कार्रवाई की, लेकिन कूनो प्रबंधन की जवाबदेही तय नहीं हुई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब चीते की सुरक्षा का मुख्य जिम्मा कूनो प्रबंधन का है तो कार्रवाई में उसके स्टाफ को अलग क्यों रखा गया? शिकारी चीते के करीब कैसे पहुंचे?
गोली चलने की आवाज निगरानी दल तक क्यों नहीं पहुंची? क्या वन मंडल के क्षेत्रीय अमले से चीते की मौजूदगी की जानकारी साझा की गई थी? इनके जवाब अभी तक नहीं मिल सके हैं। जुलाई में आगरा के पास से एसटीएफ ने अंतरराज्यीय शिकारियों को 10 तेंदुओं की खाल और अवशेष के साथ पकड़ा था।
तब पता चला था कि छह तेंदुओं का शिकार कूनो क्षेत्र में किया गया। तब भी सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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मौके पर खून के निशान भी बने पहेली
चीता जहां घायल मिला, वहां खून की बूंद नहीं मिलने का दावा किया जा रहा है। जिस रास्ते से उसके भागकर पहुंचने की बात कही गई, वहां भी खून के निशान नहीं मिले। तलाश के दौरान कनार के पास केवल दो बूंदें मिलने की बात सामने आई। ये निशान किस जानवर के थे, यह भी स्पष्ट नहीं है।
कूनो प्रबंधन की सफाई
कालर लगा होने के बाद भी ओझल हो जाते हैं चीतेकूनो प्रबंधन ने प्रेस नोट के जरिए सफाई दी है कि चीतों की निगरानी के लिए सेटेलाइट कालर बेहद अहम है, लेकिन यह तकनीक लाइव टेलीकास्ट की तरह काम नहीं करती। कालर सामान्यतः छह घंटे के अंतराल पर लोकेशन भेजते हैं।
यदि संकेत न मिले तो यह अंतर 12 से 18 घंटे तक तक पहुंच सकता है। चीते प्रतिदिन औसतन छह से आठ किलोमीटर व कई बार 12 से 15 किलोमीटर या इससे अधिक दूरी तय कर लेते हैं। टीम जब मिली हुई लोकेशन पर पहुंचती है, तब तक चीता वहां से कई किलोमीटर आगे निकल चुका होता है। इसके बाद वीएचएफ रेडियो रिसीवर से तलाश करनी पड़ती है।
घने जंगल, पहाड़, गुफाएं और गहरी घाटियां सिग्नल में बाधा बन सकती हैं। कालर से ज्यादा बार लोकेशन भेजने से बैटरी भी जल्दी खत्म होती है। सेटेलाइट तकनीक तलाश का दायरा जरूर घटाती है, लेकिन जंगल में चीतों को ट्रैक करने के लिए वनकर्मियों में सतत समन्वय जरूरी है।
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