
नईदुनिया प्रतिनिधि, उमरिया। उमरिया कालरी की चपहा इन्क्लाइन बंद होने की आशंका के विरोध में शनिवार को व्यापारी और नागरिक सड़क पर उतर आए। विरोध स्वरूप नगर के बाजार बंद कराकर व्यापारी धरने पर बैठ गए।
कालरी को बचाने और रोजगार व कारोबार पर मंडराते संकट के खिलाफ आंदोलन शुरू किया गया है। युवा व्यवसायी सचिन गुप्ता ने बताया कि पूर्व विधायक अजय सिंह के मार्गदर्शन में आंदोलन की शुरुआत की गई है। व्यापारियों ने एसईसीएल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताते हुए खदान को बंद नहीं करने की मांग उठाई।
आंदोलन में लक्ष्मी नारायण खंडेलवाल, संदीप साहा, कैट व्यापारी संगठन के अध्यक्ष कीर्ति सोनी, पप्पू सचदेव, किशोर, खेमचंद कोटवानी, अश्विनी बाधवा, राजा सोनी, अमित गुप्ता, हेमंत, जय और सचिन सहित अन्य व्यापारी शामिल रहे।
आश्वासन के बाद कर्मचारियों का स्थानांतरण
व्यापारियों और नागरिकों का कहना है कि कुछ महीने पहले क्षेत्रीय विधायक शिवनारायण सिंह और भाजपा पदाधिकारियों को आश्वासन दिए जाने के बावजूद कर्मचारियों को दूसरे स्थानों पर भेजने की प्रक्रिया जारी है।
वहीं, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उमरिया भूमिगत खदान के माइन क्लोजर एस्क्रो खाते में वर्ष 2023 में दो किस्तों में 1 करोड़ 15 लाख 33 हजार रुपये जमा किए गए हैं। इससे खदान बंद होने की आशंका और गहरा गई है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि चपहा खदान में अभी लाखों टन कोयला मौजूद है और इससे अगले 35 से 40 वर्षों तक उत्पादन संभव है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। नागरिकों का आरोप है कि प्रबंधन की कार्यप्रणाली से शहर के रोजगार और व्यापार का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
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1882 से जुड़ा है कालरी का इतिहास
उमरिया कालरी की स्थापना वर्ष 1882 में हुई थी। स्थानीय इतिहास के अनुसार, वर्ष 1966 के आसपास कोयला समाप्त होने का हवाला देकर खदान बंद कर दी गई थी। इससे रोजगार प्रभावित हुआ और अनेक कामगारों, व्यापारियों तथा नागरिकों को दूसरे क्षेत्रों की ओर पलायन करना पड़ा।
वर्ष 1974 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी ने कालरी का पुनः उद्घाटन किया था। इसके बाद खदान और शहर का आर्थिक रिश्ता फिर मजबूत हुआ।
व्यापारियों का कहना है कि क्षेत्र में रोजगार के सीमित साधनों के कारण कालरी का संचालन जारी रहना जरूरी है। अब आंदोलन के माध्यम से प्रबंधन तक अपनी बात पहुंचाने और खदान को बचाने की मांग उठाई जा रही है।
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