सूखे मेवे खाकर मैदान में उतरा 'लड़ाकू' मुर्गा, महज एक लड़ाई ने मालिक की बदली किस्मत, जीते 1.53 करोड़ रुपये
Andhra Pradesh: राजामुंद्री रमेश नाम के व्यक्ति ने ताडेपल्लीगुडेम कस्बे में आयोजित मुकाबले में 1.53 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि जीती। रमेश और गुडीवा ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 16 Jan 2026 02:09:04 PM (IST)Updated Date: Fri, 16 Jan 2026 02:09:04 PM (IST)
खास नस्ल के मुर्गे ने मालिक को रातों-रात बनाया करोड़पतिHighLights
- आंध्र प्रदेश में संक्रांति पर दांव खेल रमेश ने जीते 1.53 करोड़ रुपये
- खास नस्ल के मुर्गे ने मालिक को रातों-रात बनाया करोड़पति
- राजामुंद्री रमेश ने छह महीने से सूखे मेवे खिलाकर किया था तैयार
डिजिटल डेस्क। आंध्र प्रदेश और असम में मकर संक्रांति और माघ बिहू के उत्सवों के दौरान पशु-पक्षियों की पारंपरिक लड़ाइयों के आयोजन ने एक बार फिर चर्चा छेड़ दी है। इन आयोजनों में जहां करोड़ों के दांव लग रहे हैं, वहीं अदालती प्रतिबंधों की अनदेखी भी सामने आई है। आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले में संक्रांति के अवसर पर आयोजित मुर्गा लड़ाई (Cockfight) में एक बड़ा रिकॉर्ड बना।
राजामुंद्री रमेश नाम के व्यक्ति ने ताडेपल्लीगुडेम कस्बे में आयोजित मुकाबले में 1.53 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि जीती। रमेश और गुडीवाडा प्रभाकर के मुर्गों के बीच हुई इस भिड़ंत में रमेश का मुर्गा विजयी रहा। रमेश ने अपनी जीत का श्रेय मुर्गे की विशेष देखरेख को दिया। उसने बताया कि वह अपने मुर्गे को पिछले छह महीनों से सूखे मेवे खिलाकर तैयार किया गया था ताकि वह शारीरिक रूप से मजबूत रह सके।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश नहीं माना गया
गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में प्रतिबंधों के बावजूद बड़े पैमाने पर इन लड़ाइयों का आयोजन और सट्टेबाजी जारी है। दूसरी ओर, असम के मोरीगांव जिले में माघ बिहू के उपलक्ष्य में पारंपरिक भैंसों की लड़ाई (मोह जुज) का आयोजन किया गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन आयोजनों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद बैद्यबोरी और अहतगुरी जैसे क्षेत्रों में लोगों ने इस परंपरा को निभाया।
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स्थानीय प्रशासन ने टिप्पणी से किया इनकार
स्थानीय प्रशासन ने इस मामले को विचाराधीन बताते हुए किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। ये आयोजन माघ बिहू फसल उत्सव का एक अभिन्न हिस्सा माने जाते हैं, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल होते हैं। इन दोनों घटनाओं ने पशु अधिकारों और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच चल रहे लंबे विवाद को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।