
डिजिटल डेस्क। अरब सागर की लहरें सदियों से जिस तट को चूमती आ रही हैं, वह केवल एक मंदिर की चौखट नहीं है, बल्कि भारत की अदम्य जिजीविषा (जीने की इच्छा) और आस्था का जीवंत प्रमाण है। गुजरात के वेरावल बंदरगाह पर स्थित सोमनाथ मंदिर (प्रथम ज्योतिर्लिंग) इतिहास के उन पन्नों का गवाह है, जहां तलवार की धार और भक्ति की शक्ति के बीच बार-बार टकराव हुआ।
आज हम उस काले अध्याय के 1000 साल बाद खड़े हैं, जब महमूद गजनवी ने इस मंदिर को जमींदोज किया था। लेकिन सोमनाथ की कहानी टूटने की नहीं, बल्कि हर बार टूटकर फिर से खड़े हो जाने की है। यह कहानी विध्वंस पर निर्माण की विजय की है।

इतिहास के पन्नों में 1025-1026 ईसवी का समय सोमनाथ के लिए सबसे भयावह कालखंड था। अफगानिस्तान का शासक महमूद गजनवी, भारत की अपार धन-संपदा और मूर्ति-पूजा को नष्ट करने के इरादे से एक विशाल सेना लेकर गुजरात पहुंचा। उस समय सोमनाथ मंदिर की समृद्धि की चर्चा अरब देशों तक थी। कहा जाता है कि मंदिर में हजारों किलो सोना और बेशकीमती रत्न जड़े थे।

गजनवी ने जब आक्रमण किया, तो निहत्थे पुजारियों और स्थानीय लोगों ने मंदिर को बचाने के लिए अभूतपूर्व साहस दिखाया। इतिहासकार बताते हैं कि मंदिर की रक्षा करते हुए लगभग 50,000 श्रद्धालुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। लेकिन क्रूरता की जीत हुई। गजनवी ने शिवलिंग को खंडित किया, मंदिर को तोड़ा और ऊंटों-घोड़ों पर लादकर अथाह सोना-चांदी लूटकर ले गया। उसने सोचा था कि वह 'सोमनाथ' को मिटा देगा, लेकिन वह पत्थरों को तोड़ पाया, आस्था को नहीं।
गजनवी का हमला अंतिम नहीं था, बल्कि यह एक सिलसिले की शुरुआत थी। सोमनाथ मंदिर को इतिहास में जितनी बार तोड़ा गया, शायद ही किसी और धरोहर ने इतना दर्द सहा हो।

हर हमले के बाद मंदिर वीरान होता गया, लेकिन लोकस्मृति में 'सोमनाथ' हमेशा जीवित रहा।
जब मुख्य मंदिर खंडहर बन चुका था और मुगल शासन के डर से कोई बड़ा निर्माण संभव नहीं था, तब इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1783 में मुख्य मंदिर के पास ही एक नया शिव मंदिर बनवाया। उन्होंने ज्योतिर्लिंग को एक भूमिगत तलघर में स्थापित किया ताकि उसे बाहरी आक्रमणों से बचाया जा सके। लगभग 200 वर्षों तक पूजा-अर्चना का केंद्र यही मंदिर रहा। अहिल्याबाई का यह कदम उस दौर में सनातन धर्म के लिए संजीवनी के समान था।

सोमनाथ के आधुनिक स्वरूप की कहानी भारत की आजादी के साथ शुरू होती है। 1947 में जब जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय हुआ, तब देश के उप-प्रधानमंत्री और लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल 12 नवंबर 1947 को जूनागढ़ आए।
वेरावल के तट पर खंडहर हो चुके सोमनाथ को देखकर सरदार पटेल का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प लिया कि "इस पवित्र स्थल का पुनर्निर्माण होगा और सोमनाथ अपनी पुरानी गरिमा को पुनः प्राप्त करेगा।"

यह केवल एक मंदिर का निर्माण नहीं था, बल्कि हजारों साल की गुलामी की मानसिकता को मिटाने का प्रयास था। सरदार पटेल ने कहा था, "सोमनाथ का पुनर्निर्माण स्वतंत्रता की उस सुबह का प्रतीक है, जो सदियों की रात के बाद आई है।"
सरदार पटेल के निधन के बाद इस कार्य को कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के.एम. मुंशी) ने आगे बढ़ाया। उन्होंने इसे 'भारतीय अस्मिता का पुनरुद्धार' माना। हालांकि, उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और के.एम. मुंशी के बीच इस विषय पर वैचारिक मतभेद भी रहे, लेकिन निर्माण कार्य नहीं रुका।

11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नए मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की। उन्होंने अपने भाषण में ऐतिहासिक शब्द कहे:
सोमनाथ का मंदिर इस बात का प्रतीक है कि विध्वंस की ताकत चाहे जितनी बड़ी हो, निर्माण की शक्ति उससे हमेशा बड़ी होती है। जब तक निर्माण करने वालों के हृदय में श्रद्धा है, दुनिया की कोई भी ताकत सोमनाथ को मिटा नहीं सकती।
आज जो मंदिर हम देखते हैं, वह चालुक्य शैली (कैलाश महामेरु प्रसाद शैली) में बना है। इसके शिखर की ऊंचाई 155 फीट है और इसके ऊपर 22 फीट ऊंचा ध्वजदंड है। मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक 'बाण स्तंभ' है, जिस पर लिखा है कि यहां से अंटार्कटिका तक समुद्र के रास्ते में कोई भू-भाग नहीं आता। यह प्राचीन भारतीय भूगोल ज्ञान का अद्भुत उदाहरण है।

महमूद गजनवी के हमले के 1000 साल बाद, आज सोमनाथ मंदिर गर्व से खड़ा है। गजनवी इतिहास की किताबों में एक लुटेरे के रूप में दर्ज है, जिसने केवल तोड़ना सीखा था। वहीं, सोमनाथ उस शक्ति का प्रतीक है जो बिखरने के बाद फिर से जुड़ना जानती है।
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यह मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है। यह काल के कपाल पर लिखा वह अमिट सत्य है कि सत्य, धर्म और आस्था को तलवारों से नहीं काटा जा सकता। सोमनाथ 'कैलाश महामेरु' की तरह अटल है कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा।
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