डिजिटल डेस्क। दिल्ली की जनवरी की ठंडी शाम थी। संसद भवन के लंबे गलियारों में असामान्य सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन इस सन्नाटे के पीछे एक तूफान छिपा था सत्ता का तूफान। 19 जनवरी 1966 आजाद भारत के इतिहास में यह दिन कुछ अलग लिखे जाने वाला था।
चार घंटे से कांग्रेस संसदीय पार्टी की बैठक चल रही थी। दरवाजे बंद थे, बहसें तेज थीं और भीतर बैठे 526 सांसदों की धड़कनें किसी युद्ध से कम नहीं थीं। देश को नया प्रधानमंत्री चाहिए था और फैसला आसान नहीं था।
कुछ ही दिन पहले ताशकंद से एक मनहूस खबर आई थी। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अब इस दुनिया में नहीं थे। पूरा देश शोक में डूबा था। अस्थायी तौर पर गुलजारी लाल नंदा ने कमान संभाली, लेकिन सब जानते थे कि यह व्यवस्था ज्यादा दिन नहीं चलने वाली।
सवाल था, भारत की बागडोर किसके हाथों में जाएगी?
सत्ता की दौड़ में दावेदार तीन थे। अनुभवी और सख्त मिजाज मोरारजी देसाई, कार्यकारी प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा और एक शांत, सौम्य सी दिखने वाली महिला इंदिरा गांधी। इंदिरा, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की इकलौती संतान थीं।
राजनीति उनके लिए नई नहीं थी, लेकिन सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने का रास्ता आसान भी नहीं था। फिर भी 16 में से 11 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उनके नाम पर मुहर लगा दी थी। यह देखकर गुलजारी लाल नंदा पीछे हट गए। लेकिन मोरारजी देसाई नहीं माने।
...और फिर हुआ हाई लेवल ड्रामा
कांग्रेस के किंगमेकर के. कामराज ने टकराव टालने की भरसक कोशिश की। समझाया, मनाया, चेताया, लेकिन देसाई अड़े रहे। अब फैसला सिर्फ एक ही तरीके से होना था। वो था वोटिंग। संसद के भीतर माहौल भारी था। बाहर मीडिया, आम लोग और पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं।
इतिहास सांस रोके खड़ा था। दोपहर ढलते-ढलते तस्वीर साफ होने लगी। दोपहर बाद लगभग 3 बजे, एक अधिकारी बाहर आया। चेहरे पर गंभीरता थी, आवाज में ठहराव। उसने कहा, मैं श्रीमती इंदिरा गांधी की जीत की घोषणा करता हूँ। पल भर के लिए सन्नाटा पसर गया। फिर संसद तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी।
इतिहास ने करवट ली
इंदिरा गांधी को 355 वोट मिले थे और मोरारजी देसाई को सिर्फ 169 वोट मिले थे। सफेद साड़ी और हल्की भूरी शॉल में लिपटी इंदिरा जब संसद में दाखिल हुईं, तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही शांत महिला आने वाले वर्षों में ‘आयरन लेडी’ कहलाएगी।
कुछ ही देर में खबर देशभर में आग की तरह फैल गई। संसद के बाहर भीड़ उमड़ पड़ी। उसी शाम इंदिरा गांधी सीधे राष्ट्रपति भवन पहुंचीं और राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया।
उस दिन भारत ने सिर्फ एक प्रधानमंत्री नहीं चुना था, बल्कि उस दिन इतिहास ने पहली बार एक महिला के हाथों में सत्ता की चाबी सौंपी थी। और एक नई कहानी की शुरुआत हो चुकी थी।