
डिजिटल डेस्क: भारत के संविधान में राष्ट्रपति को यह विशेष अधिकार दिया गया है कि वे देश के किसी भी महत्वपूर्ण, जटिल या संवैधानिक प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट से राय मांग सकते हैं। इस प्रक्रिया को संविधान में प्रेसिडेंसियल रेफरेंस (Presidential Reference) कहा गया है। राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से सलाह लेने की यह व्यवस्था लोकतांत्रिक ढांचे का एक गंभीर और महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है, क्योंकि यह उन स्थितियों में स्पष्टता प्रदान करती है जहां संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या आवश्यक हो जाती है।

संविधान का अनुच्छेद 143 इस व्यवस्था की नींव है। इसके उपखंड (1) में राष्ट्रपति को तब अधिकार मिलता है जब कोई भी ऐसा कानूनी या तथ्यात्मक प्रश्न उत्पन्न हो जाए जो अत्यधिक जनमहत्व का हो। वहीं अनुच्छेद 143(2) राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वे कुछ ऐसे विवाद भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रख सकते हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट का मूल क्षेत्राधिकार अनुच्छेद 131 के तहत लागू नहीं होता। यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि राष्ट्रपति किसी भी संवैधानिक या कानूनी उलझन को स्पष्ट कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या ले सकें।

हाल के समय में प्रेसिडेंसियल रेफरेंस का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है। इसका कारण है तमिलनाडु राज्यपाल विवाद (Tamilnadu Governor Controversy) जिसने सरकार, राज्यपाल और न्यायपालिका के अधिकारों के दायरे को लेकर बड़ी बहस को जन्म दिया। तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल आर. एन. रवि के बीच पैदा हुए गतिरोध के कारण कई विधेयक लंबे समय तक लंबित रहे, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2024 में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
अप्रैल में दिए गए इस फैसले में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब विधानमंडल से पारित कोई बिल राज्यपाल के पास पहुंचता है, और यदि राज्यपाल उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए अग्रेषित करते हैं, तो राष्ट्रपति को उस तारीख से अधिकतम तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। यह पहली बार था जब सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों के लिए एक तय समय-सीमा निर्धारित की, जिसका उद्देश्य विधायी प्रक्रिया को अनावश्यक देरी से बचाना था।
न्यायालय के इस फैसले को कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने सराहा, क्योंकि राज्यों में बिलों को लंबित रखने की बढ़ती घटनाओं ने प्रशासनिक गतिरोध पैदा किए थे। लेकिन दूसरी ओर, इस फैसले ने केंद्र स्तर पर चिंता भी उत्पन्न की। राष्ट्रपति ने इस निर्णय को लेकर अपनी संवैधानिक आशंकाएं जाहिर कीं। उनका कहना था कि न्यायालय का यह निर्देश राष्ट्रपति और राज्यपाल के विवेकाधिकार पर अनुचित सीमा लगाता है, जबकि संविधान में उनके विवेक के
विषय में स्पष्ट और स्वतंत्र अधिकार प्रदान किए गए हैं।
इसी चिंता के आधार पर राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 14 महत्वपूर्ण सवाल रखे हैं। इन सवालों का मूल उद्देश्य यह समझना है कि क्या राज्यपाल या राष्ट्रपति किसी विधेयक को अपने विवेक से अनिश्चितकाल तक रोक सकते हैं, या क्या संविधान की व्याख्या में न्यायालय द्वारा समय-सीमा तय करना उचित है। इन प्रश्नों में यह भी शामिल है कि क्या राष्ट्रपति की भूमिका महज़ ‘औपचारिक’ है या वे स्वतंत्र निर्णय देने की संवैधानिक स्थिति में हैं। इन सभी मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय की राय मांगी गई है ताकि आगे किसी तरह का विवाद और अस्पष्टता न रहे।
तमिलनाडु विवाद ने इस बात को अत्यधिक स्पष्ट कर दिया कि राज्यपालों द्वारा बिलों को रोकना या लौटाना अब केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि एक संवैधानिक समस्या बनता जा रहा है। कई राज्यों में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या राज्यपालों द्वारा विधायी प्रक्रियाओं को प्रभावित करने की बढ़ती घटनाएँ संघीय ढांचे पर असर डाल रही हैं। सुप्रीम कोर्ट का ‘तीन महीने’ वाला निर्देश इसी संदर्भ में एक व्यापक समाधान के रूप में देखा गया।
अब जब राष्ट्रपति ने इस मामले में विस्तृत संवैधानिक व्याख्या मांग ली है, तो यह उम्मीद की जा रही है कि सर्वोच्च न्यायालय का मार्गदर्शन न केवल राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों को स्पष्ट करेगा बल्कि केंद्र और राज्य के बीच शक्ति-संतुलन को भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाला यह निर्णय भारतीय संघवाद, विधायी प्रक्रियाओं और संवैधानिक परंपराओं पर दीर्घकालिक असर डाल सकता है।
TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की ओर से प्रेसिडेंशियल रेफरेंस का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल पूछे गए हैं।
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