डिजिटल डेस्क। सुबह का सूरज जब हिमालय की चोटियों को छूता था, तो बर्फ ऐसे चमकती थी जैसे धरती ने आकाश का एक टुकड़ा ओढ़ लिया हो। हवा में ठंडक नहीं, एक वादा होता था कि नदियां बहेंगी, खेत हरे रहेंगे और जीवन चलता रहेगा। लेकिन अब उस सफेद चादर में जगह-जगह दरारें हैं।
धरती का तापमान बढ़ चुका है। जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की कहानी नहीं, बल्कि आज की कड़वी सच्चाई है। देर से आती सर्दियां, पहाड़ों से चुपचाप खिसकती बर्फ और समुद्र का उठता पानी, ये सब प्रकृति की वो चेतावनियां हैं, जिन्हें अनसुना करना अब नामुमकिन हो गया है।
दो दशकों में इस बार हिमालय पर सबसे कम बर्फबारी
इसी बेचैनी के बीच हिंदू-कुश हिमालय से आई एक रिपोर्ट ने जैसे सन्नाटा तोड़ दिया। इंटरनेशनल सेंटर ऑफ इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के सैटेलाइट डेटा ने बताया कि पिछले दो दशकों में इस बार हिमालय पर सबसे कम बर्फबारी दर्ज की गई है।
बीते 23 वर्षों में ऐसा कमजोर स्नो सीजन पहले कभी नहीं देखा गया। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, ये उन नदियों की धड़कन हैं, जो हिमालय की गोद से निकलकर करोड़ों जिंदगियों तक पहुंचती हैं।
वो चेतावनी, जो अब सच होती दिख रही है
कभी जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) ने चेताया था कि अगर धरती का तापमान यूं ही बढ़ता रहा, तो बर्फबारी का मौसम छोटा होता जाएगा। ऊंचाइयों पर बर्फ कम समय ठहरेगी और वो चोटियां, जिन्हें हम सदियों से सफेद देखते आए हैं, धीरे-धीरे पथरीली नजर आने लगेंगी। आज वही भविष्य वर्तमान बनकर सामने खड़ा है।
एशिया का ‘वॉटर टावर’ प्यासा है हिंदू-कुश
हिमालय को यूं ही एशिया का ‘वॉटर टावर’ नहीं कहा जाता। यहीं से गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी जीवनरेखाएं जन्म लेती हैं। इन्हीं नदियों से मैदानों में हरियाली, शहरों में पानी और सभ्यताओं में निरंतरता बनी रहती है। लेकिन जब पहाड़ों पर बर्फ कम पड़ेगी, तो नदियों की धार भी कमजोर पड़ेगी। पहले बाढ़ का खतरा, फिर सूखे का साया और अंत में संघर्ष।
पहाड़ों की चुप्पी बहुत कुछ कह रही है
अफगानिस्तान से लेकर उत्तरी पाकिस्तान और ताजिकिस्तान तक फैली लगभग 800 किलोमीटर लंबी हिंदू-कुश पर्वत श्रृंखला आज एक अनकही कहानी सुना रही है। इन पहाड़ों में बसे हजारों ग्लेशियर अब धीमे-धीमे पिघल रहे हैं, जैसे समय खुद उनसे जीवन छीन रहा हो।
अगर ये बर्फ यूं ही विदा लेती रही, तो सवाल सिर्फ पहाड़ों का नहीं रहेगा। सवाल हमारी नदियों, हमारी खेती, हमारे भविष्य का होगा। हिमालय आज भी खड़ा है, मगर उसकी सफेदी कम हो रही है। और जब पहाड़ चुप हो जाते हैं, तो समझिए प्रकृति कुछ बहुत बड़ा कहने वाली है।