मुख्य चुनाव आयुक्त को आजीवन कानूनी संरक्षण देने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए मुकदमों से आजीवन संरक्षण देने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप् ...और पढ़ें
Publish Date: Mon, 12 Jan 2026 05:17:06 PM (IST)Updated Date: Mon, 12 Jan 2026 05:17:05 PM (IST)
मुख्य चुनाव आयुक्त को आजीवन कानूनी संरक्षण देने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्तHighLights
- इस कानून की संवैधानिक वैधता पर जवाब मांगा
- 2023 में किया गया था कानून में संशोधन
- यह एक गंभीर और महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है
डिजिटल डेस्क। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए मुकदमों से आजीवन संरक्षण देने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।
इस मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर इस कानून की संवैधानिक वैधता पर जवाब मांगा है।
इतनी कानूनी छूट तो राष्ट्रपति को भी प्राप्त नहीं
यह याचिका एनजीओ लोक प्रहरी की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इतनी व्यापक कानूनी छूट तो भारत के राष्ट्रपति को भी प्राप्त नहीं है। याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक भावना को कमजोर करता है।
क्या इस प्रावधान से कोई नुकसान हो रहा है?
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि यह एक गंभीर और महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है। कोर्ट इस बात की जांच करेगा कि क्या इस प्रावधान से किसी तरह का नुकसान हो रहा है और क्या संविधान के तहत इस तरह की कानूनी छूट दी जा सकती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस कानून पर कोई अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। CJI ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर स्टे की आवश्यकता नहीं है।
2023 में किया गया था कानून में संशोधन
गौरतलब है कि वर्ष 2023 में कानून में संशोधन किया गया था, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के संबंध में किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई से संरक्षण प्रदान किया गया है।
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इस संशोधन के अनुसार, उनके खिलाफ आधिकारिक कार्यों को लेकर कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता।एनजीओ लोक प्रहरी ने इस संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा है कि यह प्रावधान जवाबदेही के सिद्धांत के खिलाफ है और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।