Astrology : प्रायः ज्योतिष की बात सामने आते ही ग्रह और राशियों की बात ही दिमाग में आती है। राशियों और ग्रहों के परिचय से पूर्व नक्षत्रों का जानना उचित होगा। आकाश में असंख्य तारों को कुछ समूहों में विभाजित किया गया है। इन तारा समूहों को ही नक्षत्र कहा जाता है। नक्षत्रों की आवश्यकता क्यों हुई, यह सवाल पूछा जा सकता है। चूंकि किसी भी विश्लेषण में व्यक्ति स्वभावतः हर चीज़ के टुकड़े करके एनालिसिस करता है अतः यहां ज्योतिर्विदों ने भी समस्त ब्रह्माण्ड के तारों को अलग अलग समूहों में बांटकर इनका अध्ययन किया। इससे एक सुविधा ये भी हुई है कि अनंत आकाश में कोई ग्रह कहां स्थित है, इसको भी आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। कौन सा ग्रह फलां तारासमूह (नक्षत्र) में स्थित है, किसी एक ग्रह से दूसरे ग्रह की दूरी को भी आसानी से मार्क किया जा सकता है। समस्त आकाश मंडल को ज्योतिष शास्‍त्र में 27 तारा समूहों में विभक्त किया। यही 27 समूह ज्योतिष में 27 नक्षत्र के नाम से जाने जाते हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं।

१- आश्विन , 2- भरनी , 3- कृतिका , 4- रोहिणी , 5- मृगशिरा , 6- आद्रा , 7- पुनर्वसु , 8- पुष्य , 9- अश्वलेशा , 10-मघा , 11-पूर्वाफाल्गुनी , 12- उत्तराफाल्गुनी , 13- हस्त , 14-चित्रा , 15-स्वाति , 16-विशाखा , 17-अनुराधा , 18-ज्येष्ठा , 19-मूल , 20-पूर्वाषाढ़ा , 21-उत्तराषाढ़ा , 22-श्रवण , 23-धनिष्ठा , 24-शतभिषा , 25-पूर्वभाद्रपद , 26-उत्तराभाद्रपद , 27-रेवती

यह है नक्षत्रों की अवधि और प्रकार

नक्षत्रों को और भी आसानी से समझने के लिए इनको चरण में विभक्त कर दिया गया। प्रत्येक नक्षत्र के चार भाग किये जो इनके चरण कहे जाते हैं। प्रत्येक नक्षत्र का मान 13 डिग्री 20 मिनट का होता है। इस लिहाज से नक्षत्र के एक चरण का मान 3 डिग्री 20 मिनट होता है। इस कैलकुलेशन से एक बात स्‍पष्‍ट हो जाती है कि एक राशि पर 3 नक्षत्रों के क्षेत्र में विस्तृत रहती है। इनके 2 नक्षत्रों के 4-4 चरण एवं एक नक्षत्र का एक चरण अर्थात प्रत्येक राशि में नक्षत्रों ने 9 चरण होते हैं। यदि आप मुहूर्त विचार में रूचि रखते हैं तो निश्चित ही नक्षत्रों का विशद अध्ययन आपको करना चाहिए, जैसे कुछ नक्षत्र पंचक संघ्यक कहे गए। कुछ मूल संघ्यक , कुछ अधोमुख , उर्धमुख , तिर्यकमुख , दग्ध और मासशून्य आदि।

Astrology : अमीरों की कुंडली में होते हैं विशेष ग्रह-नक्षत्र, जानिये इसका ज्‍योतिष पक्ष

अक्‍सर यह सवाल सभी के मन में उठता है कि आखिर कोई अमीर कैसे हो जाता है और कोई गरीब कैसे रह जाता है। ऐसा क्‍यों होता है कि औसत आदमी कई बार दौलतमंद बन जाता है और प्रतिभावान शख्‍स संघर्ष ही करता रह जाता है। हर कोई धन कुबेर नही होता ना ही करोड़ोंं में खेलता है। ये सब भाग्य व ग्रहों की माया ही होता है। जो जन्म के समय विध्यमान होते हैं। कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि एक ही समय में दो बालक जन्म लेते हैं तो दोनो ही धन कुबेर क्यों नही होते। ये तर्क उनका भी सही है। हम यहा पर स्पष्ट करना चाहते हैंं कि ऐक गरीब के याहा जन्म लेता है तो एक व्यवसाई के यहां। दोनों के ग्रह एक समान हो व लग्न या चन्द्र लग्न एक ही हो, तब एक जातक गरीब ना रहकर पहले से अधिक धनी किसी भी योग्यता के कारण बनेगा। जिसे प्रारंभ से व्यवसायी के यहां या उद्योग पति के यहां जन्म लेता है वो निश्चित ही धन कुबेर हो जाता है। आइये इन 11 कारणों से समझते हैं।

1. मेष लग्न हो व लग्न का स्वामी मंगन भाग्य मे होकर गुरु की राशि धनु में हो व गुरु लग्न में मंगल की राशि मेष में होनें से राशि परिवर्तन होने से एसा जातक महाधनी होगा।

2. वृषभ लग्न हो व लग्न में शनि हो एंव शुक्र की स्थिति नवम भाव मे होतो एसा जातक धनी स्वप्रयत्नोंं से होगा।

3. मिथुन लग्न में बुध नवम शनि की राशि कुंभ में हो व नवम का स्वामी शनि चतुर्थ भाव में शनि हो तो एसा जातक धनवान होगा।

4. कर्क लग्न में एकादशेश शुक्र स्वराशि का होकर चतुर्थ भाव में होतो एसा जातक संपत्तिवान होता है।

5. सिंह लग्न में भाग्य का स्वामी मंगल चतुर्थ भाव में होतो एसा जातक धनी जमीन के सौदे या जमीनी कारोबार से धनी बनता है।

6. तुला लग्न हो व शनि सुखेश व पंचमेश होकर लग्न में हो व लग्न का स्वमी पंचम मे हो तो एसा जातक कला, इंजिनियर, चिकित्सा के क्षैत्र में नाम कमाकर धनी भी होता है। चतुर्थ में शुक्र का होना वाहनाधिपति बनाता है या ट्रवल एजेन्सी से धनी बनता है।

7.वृश्चिक लग्न में मंगल पंचम मे हो व पंचमेश गुरु लग्न मे होतो ऐसा जातक अपनी योग्तानुसार धनी बनता है। सप्तम का शुक्र जीवन साथी से लाभकराता है।

8. धनु लग्न हो व लग्न का स्वामी गुरु नवम मे हो व नवम भाव का स्वामी सूर्य लग्न में हो तो ऐसा जातक भाग्य से अमीर बनता है।

9. मकर लग्न में लग्न का स्वामी शनि पंचम मे शुक्र की राशि मे हो व शुक्र लग्न में होतो कलात्मक वस्तुओ के व्यवसाय से धनी बनता है।

10. कुभ लग्न हो व लग्न का स्वामी शनि नवम भाग्य मे हो व भाग्य का स्वामी शुक्र लग्न मे हो तो वह जातक धनी बनता ही है।

11. मीन लग्न हो व लग्न पंचम मे होकर बध्ेइा होतो लक्ष्मीनारयण योग के होने से अपनी बलबुधी से धनवान होता है। यहां पर कन्या लग्न के बारे मे नही दिया गया है। ऐसे जातक कम ही धनी होते है। ये तभी होता है जब कोई अशुभ योग नाहो नाही अशुभ योगो से ग्रस्ति ना हो।

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Posted By: Navodit Saktawat

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