
धर्म डेस्क। वृंदावन की गलियों में सुबह के अंधेरे में जब दुनिया सो रही होती है, तब एक संत अपने आराध्य की ओर बढ़ रहा होता है। यह संत कोई और नहीं, बल्कि आज के समय के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरुओं में से एक प्रेमानंद महाराज हैं। सोशल मीडिया से लेकर प्रवचन पंडालों तक, उनकी वाणी आज लाखों युवाओं और भक्तों के लिए मार्गदर्शन का केंद्र बनी हुई है। आइए जानते हैं, कानपुर के एक साधारण बालक 'अनिरुद्ध' से 'प्रेमानंद महाराज' बनने तक की उनकी विस्मयकारी जीवन यात्रा।
प्रेमानंद महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के सरसौल गांव में एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। भक्ति के संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे; उनके दादा एक सन्यासी थे और माता-पिता भी अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के थे।
बचपन में जब अन्य बच्चे खेल-कूद में व्यस्त रहते, तब नन्हे अनिरुद्ध एकांत में बैठकर ध्यान लगाने और मंत्र जाप करने में लीन रहते थे। आध्यात्मिकता की भूख इतनी प्रबल थी कि मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में, जब बच्चे भविष्य के सपनों में खोए होते हैं, उन्होंने घर का त्याग कर दिया और संन्यास की राह चुन ली।
घर छोड़ने के बाद उन्होंने नैमिषारण्य में आध्यात्मिक दीक्षा ली। कठिन तप और साधना के इस दौर में उन्हें 'आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी' के नाम से जाना गया। उन्होंने कई वर्षों तक गंगा के किनारे नंगे पैर और निराहार रहकर घोर तपस्या की। संन्यास के शुरुआती दिनों में उन्होंने भगवान शिव की उपासना की और अपना जीवन मोक्ष प्राप्ति के लिए समर्पित कर दिया।
कहते हैं कि एक बार उन्हें किसी संत के माध्यम से वृंदावन की महिमा और भगवान कृष्ण की रासलीला का ज्ञान हुआ। महादेव की आज्ञा मानकर वे वृंदावन चले आए। वृंदावन की रज (मिट्टी) में कदम रखते ही उनका हृदय पूरी तरह बदल गया। वे राधा वल्लभ संप्रदाय से जुड़े और चैतन्य महाप्रभु की भक्ति पद्धति से प्रभावित हुए।
यहीं उनकी मुलाकात उनके गुरु गौरांगी शरण महाराज से हुई। गुरु की संगत में रहकर उन्होंने करीब 10 वर्षों तक सेवा की। इसी दौरान राधा रानी के चरणों में अनन्य भक्ति के कारण उन्हें नया नाम मिला 'प्रेमानंद गोविंद शरण', जिन्हें आज दुनिया 'प्रेमानंद महाराज' के नाम से पूजती है।
प्रेमानंद महाराज का जीवन आज के दौर में किसी चमत्कार से कम नहीं है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह खराब हो चुकी हैं और वे पिछले कई वर्षों से डायलिसिस पर हैं। किसी साधारण मनुष्य के लिए बिस्तर से उठना भी मुश्किल होता, लेकिन महाराज जी हर रात 2 बजे उठकर वृंदावन की परिक्रमा करते हैं और घंटों तक भक्तों को ऊर्जावान प्रवचन देते हैं।
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उनके विश्वास की गहराई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी किडनियों का नाम भी 'राधा' और 'कृष्ण' रखा है। वे कहते हैं कि यह शरीर केवल राधा रानी की सेवा का माध्यम है, और जब तक उनकी इच्छा है, यह सांसे चलती रहेंगी।
आज इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर महाराज जी के छोटे-छोटे वीडियो क्लिप्स (Reels) करोड़ों बार देखे जाते हैं। उनके प्रवचन किताबी नहीं होते, बल्कि व्यावहारिक होते हैं। वे युवाओं को नशे, दुराचार और अवसाद से बाहर निकालकर 'नाम जप' और 'सदाचार' की ओर प्रेरित करते हैं। बड़े-बड़े राजनेता, क्रिकेटर (जैसे विराट कोहली) और फिल्मी सितारे भी उनके चरणों में आशीर्वाद लेने वृंदावन पहुंचते हैं।