
धर्म डेस्क। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की हर घटना एक महान उद्देश्य और 'लीला' से जुड़ी होती है। अक्सर लोग श्रीकृष्ण की 16,108 रानियों की बात सुनकर अचंभित हो जाते हैं और इसे केवल एक विवाह कथा के रूप में देखते हैं। लेकिन इसके पीछे की असली कहानी त्याग, सामाजिक न्याय और नारी अस्मिता की रक्षा का एक अद्भुत उदाहरण है।
आइए जानते हैं कि आखिर क्यों द्वारकाधीश को इतनी रानियों से विवाह करना पड़ा और इसके पीछे का आध्यात्मिक सत्य क्या है।
श्रीकृष्ण की कुल रानियों में 8 को 'पटरानी' का दर्जा प्राप्त था, जिन्हें सामूहिक रूप से 'अष्टभार्या' कहा जाता है। ये सभी अलग-अलग गुणों और शक्तियों का प्रतीक थीं:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राग्ज्योतिषपुर का असुर राजा नरकासुर अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर था। उसने अपनी शक्ति के मद में आकर देवताओं और राजाओं की 16,100 कन्याओं को बंदी बना लिया था। इन कन्याओं को उसने एक दुर्गम कारागार में कैद कर रखा था।
जब श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का वध किया, तो उन्होंने इन हजारों कन्याओं को मुक्त कराया। लेकिन असली चुनौती इसके बाद शुरू हुई:
यह भी पढ़ें- घोड़े की नाल: महज सजावट नहीं, घर का सुरक्षा कवच है यह! बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का अचूक उपाय
श्रीकृष्ण का यह विवाह कोई साधारण शारीरिक संबंध नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक तथ्य छिपे हैं:
श्रीकृष्ण की 16,108 रानियों की कथा हमें यह सिखाती है कि धर्म केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि असहायों को न्याय दिलाना और उनके सम्मान की रक्षा करना है। श्रीकृष्ण ने उन कन्याओं को केवल अपना नाम नहीं दिया, बल्कि उन्हें समाज में सर्वोच्च स्थान दिलाकर यह सिद्ध किया कि चरित्र और सम्मान बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि से तय होता है।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। नईदुनिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। नईदुनिया अंधविश्वास के खिलाफ है।