
स्पोर्ट्स डेस्क। भारतीय क्रिकेट इतिहास में कुछ ऐसे खिलाड़ी हुए हैं जिन्होंने खेल के प्रति नजरिए को ही बदल दिया। उन्हीं में से एक थे मंसूर अली खान पटौदी (Mansoor Ali Khan Pataudi), जिन्हें दुनिया आज भी 'टाइगर पटौदी' के नाम से याद करती है। 5 जनवरी 1941 को जन्मे पटौदी को भारतीय क्रिकेट में एक रणनीतिकार और साहसी कप्तान के रूप में पूजा जाता है।
पटौदी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने भारतीय टीम को विदेशों में पहली टेस्ट सीरीज जीत दिलाई। उनकी कप्तानी में भारत ने 1967-68 में न्यूजीलैंड को उसी के घर में हराकर इतिहास रचा था। उन्होंने कुल 40 टेस्ट मैचों में टीम इंडिया का नेतृत्व किया, जिनमें से 9 में जीत दर्ज की।
महज 20 साल की उम्र में इंग्लैंड में हुए एक कार हादसे ने उनकी दाहिनी आंख की रोशनी छीन ली थी। डॉक्टरों ने उनका करियर खत्म मान लिया था, लेकिन हार न मानते हुए उन्होंने मैदान पर वापसी की। एक आंख से गेंद को देखने में परेशानी के बावजूद उन्होंने 46 टेस्ट मैचों में 6 शतकों के साथ 2793 रन बनाए। उनकी फील्डिंग भी उस दौर में बेमिसाल मानी जाती थी।
राजघराने से ताल्लुक रखने वाले मंसूर अली खान, बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान के पिता थे। उन्हें क्रिकेट विरासत में मिली थी; उनके पिता इफ्तिखार अली खान भारत और इंग्लैंड दोनों देशों के लिए खेले थे। पिता के निधन के बाद 11 साल की उम्र में वे नवाब बने। वहीं, 1962 में नारी कॉन्ट्रैक्टर के चोटिल होने के बाद, महज 21 साल की उम्र में उन्हें टीम इंडिया की कप्तानी सौंपी गई, जिससे वे उस समय के सबसे युवा भारतीय कप्तान बने।
पटौदी का जीवन अनुशासन और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की प्रेरणा देता है। वे न केवल एक बेहतरीन क्रिकेटर थे, बल्कि एक ऐसे लीडर थे जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को आत्मविश्वास और गौरव दिलाया।
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