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नईदुनिया प्रतिनिधि, शिवपुरी। प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना में आदिवासी हितग्राहियों के मकानों में 70 लाख 38 हजार रुपये के कथित गबन के चर्चित मामले में विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, शिवपुरी की अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है।
विशेष सत्र प्रकरण क्रमांक एससी/24/2026 में आरोपित तत्कालीन सचिव जीवन सिंह यादव को अदालत ने सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है। आरोपित की ओर से अधिवक्ता करण कटारिया ने पैरवी की।
क्या था आरोप ?
प्रकरण की शुरुआत जनपद पंचायत के तत्कालीन सीईओ मोंगराज मीणा की शिकायत से हुई थी। आरोप था कि ग्राम पंचायत गताझलकुईं में 125 आदिवासी हितग्राहियों के पीएम जनमन आवास का काम सचिव ने अपने हाथ में ले लिया था।
आरोप पत्र में कहा गया था कि मकान पूरे नहीं कराए गए, मृतक और पूर्व से लाभ ले चुके 11 अपात्र लोगों को भी आवास दे दिए गए, 70.38 लाख रुपये की राशि में हेराफेरी की गई और मनरेगा की 7,25,628 रुपये की मजदूरी राशि भी अपात्र जाब कार्डों में ट्रांसफर कर दी गई।
इसी विभागीय जांच रिपोर्ट के आधार पर थाना बामौरकलां में अपराध क्रमांक 112/2025 दर्ज हुआ था और पुलिस ने धारा 316(5) बीएनएस (लोक सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ए) के तहत चालान पेश किया था।
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कोर्ट में क्यों नहीं टिक पाया केस ?
31 अक्टूबर 2026 को पारित निर्णय में विशेष न्यायाधीश संजय श्रीवास्तव ने अभियोजन की पूरी कहानी को संदेह के घेरे में बताते हुए कहा कि, जांच दल के सदस्यों ने कोर्ट में यह स्वीकार किया कि आरोपी और 125 हितग्राहियों के बीच मकान बनाने का कोई लिखित अनुबंध, सहमति पत्र या रसीद आज तक रिकॉर्ड पर नहीं है।
बिना अनुबंध के यह मानना मुश्किल है कि पैसा सचिव को सौंपा गया था। विवेचना में ऐसा कोई बैंक स्टेटमेंट, कैश रिसीविंग या हितग्राही का विश्वसनीय बयान नहीं मिला, जिससे साबित हो कि कथित 70.38 लाख रुपये आरोपित के कब्जे में आए थे। पूरे विवेचना कॉल में आरोपित से गबन की राशि में से एक रुपये की भी बरामदगी नहीं हुई, न ही कोई संपत्ति अटैच हुई जो गबन से खरीदी गई हो।
कई हितग्राही साक्षियों ने कोर्ट में कहा कि उन्होंने मकान का काम खुद कराया था, सचिव ने उनसे जबरदस्ती काम नहीं लिया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा कि केवल विभागीय जांच प्रतिवेदन के आधार पर किसी लोक सेवक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य से यह साबित न हो कि संपत्ति उसको न्यस्त की गई थी और उसने बेईमानी से उसका गबन किया।
अभियोजन दोनों ही बातें संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। इसी आधार पर अदालत ने जीवन सिंह यादव को बीएनएस की धारा 316(5) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ए) के आरोपों से बरी कर दिया।
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