
डिजिटल डेस्क। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने झूठी एफआईआर दर्ज कराने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि झूठी एफआईआर दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ता ही नहीं, बल्कि उनके गवाहों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने आदेश दिया है कि यदि किसी मामले की विवेचना के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई अपराध बनता ही नहीं है और अंतिम/क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जाती है, तो विवेचना अधिकारी को शिकायतकर्ता एवं गवाहों के विरुद्ध लिखित शिकायत भी प्रस्तुत करनी होगी।
यह शिकायत बीएनएस की धारा 212 और 217 (पूर्व में आईपीसी की धारा 177 व 182) के अंतर्गत होगी, ताकि बीएनएस की धारा 215(1)(ए) (सीआरपीसी की धारा 195(1)(ए)) के तहत संज्ञान लिया जा सके।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि इस कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी की गई तो विवेचना अधिकारी, थाना प्रभारी, सर्किल अधिकारी ही नहीं, बल्कि संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई और अदालत की अवमानना की कार्यवाही हो सकती है।
इस संबंध में हाई कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि वे अधीनस्थ अधिकारियों के लिए आवश्यक आदेश जारी करें। कोर्ट ने कहा कि यदि विवेचना अधिकारी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, तो केवल रिपोर्ट दाखिल करना पर्याप्त नहीं होगा।
उसे पुलिस रेगुलेशन के अनुसार झूठी सूचना देने के लिए विधिवत शिकायत दर्ज कराना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस और न्यायिक अधिकारियों के आचरण के विरुद्ध हाई कोर्ट में उचित कार्रवाई के लिए संपर्क किया जा सकता है।
एकलपीठ ने सभी न्यायिक मजिस्ट्रेटों और अधीनस्थ अदालतों को निर्देश दिया है कि अभियुक्त के पक्ष में क्लोजर रिपोर्ट आने की स्थिति में वे पूरी केस डायरी का अवलोकन करें। साथ ही, जांच अधिकारी को सूचक (वादी) और एफआईआर में नामित गवाहों के विरुद्ध लिखित शिकायत प्रस्तुत करने का निर्देश दें, जैसा कि सीआरपीसी की धारा 195(1)(ए) (तदनुरूप बीएनएसएस की धारा 215(1)(ए)) में प्रावधानित है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि संज्ञान लेने से पूर्व न्यायिक मजिस्ट्रेट पूरे अभिलेखों का परीक्षण करें। यदि प्रथमदृष्टया अपराध बनता प्रतीत न हो, तो शिकायतकर्ता से विरोध याचिका (प्रोटेस्ट पिटीशन) आमंत्रित कर उसे सुनें। इसके पश्चात यदि अपराध बनता है, तभी सीआरपीसी की धारा 190(1)(ए) या 190(1)(बी) के तहत संज्ञान लिया जाए।
इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पुलिस महानिदेशक, पुलिस आयुक्त, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक यह सुनिश्चित करें कि सभी विवेचना अधिकारी, थाना प्रभारी, सर्किल अधिकारी, अपर पुलिस अधीक्षक एवं लोक अभियोजक अंतिम/क्लोजर रिपोर्ट के साथ आवश्यक शिकायत भी अनिवार्य रूप से दाखिल करें। इस आदेश के अनुपालन के लिए 60 दिनों की समय-सीमा तय की गई है।
मामले के अनुसार, अलीगढ़ निवासी उम्मे फारवा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपने पूर्व पति महमूद आलम खान द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को चुनौती दी थी। याची ने पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को सही ठहराते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा प्रोटेस्ट याचिका स्वीकार कर केस कायम करने की कार्रवाई को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया था।
याची और विपक्षी पहले कोरिया के सियोल में रहते थे। लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर विवाद के बाद दोनों का तलाक हो गया। इसके पश्चात पूर्व पति ने अलीगढ़ के क्वार्सी थाने में एफआईआर दर्ज करा दी। पुलिस ने विवेचना के बाद अंतिम रिपोर्ट दाखिल की, लेकिन प्रोटेस्ट याचिका पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मामला कायम रखते हुए याची को समन जारी कर दिया।
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इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की सफाई को आंशिक रूप से संतोषजनक माना और स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों का उनके भविष्य के कैरियर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, हाई कोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया है कि मामले में नए सिरे से, विधि के अनुसार अभियुक्त को सुनकर निर्णय लिया जाए।