नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। बस्तर में जर्जर भवनों में स्कूल-आंगनबाड़ी का संचालन कोई नई बात नहीं है। ऐसा यहां कई गांवों में हो रहा है। भवनों की कमी केे कारण एक-दो कमरे में पांच या इससे अधिक कक्षाओं का संचालन और घास-फूस की झोपड़ियों में स्कूल, आंगनबाड़ी भी बहुतायत संख्या में हैं।
पर देश में शायद ही कहीं और ऐसी स्थिति देखी सुनी गई होगी जहां बीते सात सालों से जर्जर आंगनबाड़ी भवन के एक कमरे में आधे में स्कूल, आधे में आंगनबाड़ी का संचालन किया जा रहा है। जिला मुख्यालय जगदलपुर से लगभग 45 किलोमीटर दूर लोहंडीगुड़ा विकासखंड के ग्राम पंचायत मिचनार-01 के टांगरापारा में यह अजब-गजब मौजूद है।
सरपंच दिवालो पोडियामी बताती हैं कि प्राथमिक शाला टांगरापारा के पांच कक्षाओं में 25 बच्चे दर्ज हैं और आंगनबाड़ी में तीन से छह साल आयु वर्ग के 29 नौनिहाल दर्ज हैं। स्थिति यह है कि न तो स्कूल में पढ़ाई होेती है न ही आंगनबाड़ी में गतिविधियां हो पाती हैं। यहां के ग्रामीणों की माने तो एक कमरे में संचालित स्कूल और आंगनबाड़ी दोनों दाल भात केंद्र बनकर रह गए हैं।
सरपंच दिवालो पोडियामी बताती हैं कि लगभग 20 साल पहले यहां प्राथमिक शाला खोला गया था। एक दशक से भी कम समय में भवन जर्जर हो गया तो स्कूल को आंगनबाड़ी भवन में स्थानांतरित कर दिया गया था। बीते कई सालों से नए स्कूल भवन की मांग शासन-प्रशासन से की जा रही है पर कोई सुनने वाला नहीं है।
दो-तीन लाख रुपये खर्च कर एक अतिरिक्त कक्ष भी सरकार बनवा देती तो कम से कम थोड़ी राहत मिल जाती। क्षेत्र के युवा सामाजिक कार्यकर्ता और ग्राम पंचायत मिचनार-02 के सरपंच जोगराम कहते हैं कि गांव वालों से भी स्कूल-आंगनबाड़ी की दुर्दशा अब नहीं देखी जाती।
आंगनबाड़ी भवन भी जर्जर है इसलिए हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है। खंड शिक्षा अधिकारी शालिनी तिवारी से इस स्कूल के बारे में चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि लोहंडीगुड़ा ब्लाक में प्राथमिक से लेकर हायर सेकेंडरी तक 330 स्कूल हैं। इनमें 60-65 स्कूल भवन जर्जर और कुछ अति जर्जर हैं। नए भवनों की मांग का प्रस्ताव जिला शिक्षा कार्यालय को भेजा गया है।
भविष्य मत बर्बाद करो
सरपंच दिवालो पोड़ियामी नवमीं कक्षा तक पढ़ी हैं। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधि और अधिकारी शिक्षा के प्रसार-प्रचार को लेकर भाषण देते हैं पर व्यवस्था सुधारने में सहयोग करने की बारी आती है तो ध्यान नहीं देते। सरपंच ने कहा कि वह दुखी है कि उसके गांव के बच्चों का भविष्य बर्बाद किया जा रहा है।
पालक बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर रहे
नईदुनिया से कुछ ग्रामीणों और पंचायत के जागरूक युवाओं से बाता की तो पता चला कि इस स्कूल में दो शिक्षक अशोक नायडू और रामचंद राजपूत की पदस्थापना है। अशोक नायडू लंबे समय से अवकाश पर हैं और रामचंद राजपूत दूसरे गांव अलनार में संलग्न हैं।
यहां स्कूल में बच्चों को मध्यान्ह भोजन मिलता रहे इसलिए दूसरे गांव से एक शिक्षक अमित बरिहा को तीन माह से संलग्न करके रखा गया है। गांव में 101 परिवार हैं और लगभग पांच सौ की आबादी है। स्कूल में पढ़ाई नही होती इसलिए पालक बच्चों को स्कूल भेजने से कतराने लगे हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अनिता कश्यप का कहना है कि आंगनबाड़ी भवन में स्कूल के संचालन से केंद्र के बच्चों को परेशानी हो रही है। बच्चे भी कम आते हैं।
एक शिक्षक क्या कर लेगा
शिक्षक अमित बरिहा से चर्चा करने पर उन्होंने नईदुनिया से कहा कि एक कमरे में एक ही समय पर स्कूल और आंगनबाड़ी के संचालन से परेशानी होना स्वाभाविक है। एक शिक्षक स्कूल की जानकारी तैयार करने में बहुत समय निकल जाता है। जितना समय मिलता है पढ़ाई कराते हैं। उनका कहना था कि आप ही बताइए एक शिक्षक क्या कर लेगा। शैक्षणिक माहौल भी तो होना चाहिए।
बच्चे स्कूल छोड़ रहे
अभिभावक समलूराम कश्यप स्कूल और आंगनबाड़ी की दुर्दशा से दुखी हैं। उनका कहना है कि एक ही कमरे में छोटे-छोटे बच्चों से लेकर पांचवी तक के बच्चे एक साथ फर्श पर बैठकर पढ़ते हैं, वहीं बगल में आंगनबाड़ी के बच्चे भी रहते हैं। शोर और भीड़ के कारण न तो स्कूल की पढ़ाई हो पाती है, न ही आंगनबाड़ी की गतिविधियां ठीक से चल पाती हैं। सात-आठ साल से यही तमाशा हो रहा है। समलूराम बताते हैं कि गांव की 99 प्रतिशत आबादी आदिवासी हैं। यहां कम उम्र के स्कूल जाने लायक 15-20 बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं।
शासन को भेजी गई है जानकारी
बस्तर संभाग में जर्जर और अति जर्जर भवनों की जानकारी शासन को भेजी जाती है। नए भवनों का निर्माण और जर्जर भवनों की मरम्मत का काम भी प्रशासन और स्थानीय निकाय द्वारा कराया जा रहा है। प्राथमिक शाला टांगरापारा की स्थिति की जानकारी सामने लाई गई है। जिला शिक्षा अधिकारी से रिपोर्ट मांगी जाएगी। एचआर सोम, संयुक्त संचालक शिक्षा बस्तर संभाग