नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश के श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में बसाए गए चीते जंगल परिसर में बने तालाबों, नालों और यहां तक कि कूनो नदी में भी तैरते देखे जा रहे हैं, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार चीतों का व्यवहार पानी से दूरी बनाकर रहने का माना जाता है। खासकर भारत में जन्मे चीते इस धारणा को तोड़ रहे हैं।
चीता प्रोजेक्ट से जुड़े और सिंह परियोजना के निदेशक उत्तम कुमार शर्मा के अनुसार हाल ही में वर्षा के दौरान तेज बहाव के बावजूद चीतों को नदी पार करते देखा गया। यह थोड़ा अचरज भरा जरूर है क्योंकि चीता प्रोजेक्ट की शुरुआत में विशेषज्ञों द्वारा यह कहा गया था कि चूंकि नेशनल पार्क के समीप ही कूनो नदी है, ऐसे में चीतों को लेकर सतर्कता बरते जाने की जरूरत है। अब भारत में जन्म लेने वाले चीते नदी-नालों में तैरते देखे जा रहे है।
बता दें कि कूनो नेशनल पार्क से सटी हुई कूनो नदी के अलावा आगे इस कारिडोर में चंबल नदी भी है। बरसाती नाले भी उफान पर रहते हैं, कई तालाब भी हैं। ऐसे में चीतों के व्यवहार में इस बदलाव को लेकर प्रबंधन सतर्क भी है क्योंकि डेढ़ साल पहले चीता पवन की बरसाती नाले में डूबने से मौत हो गई थी। वर्तमान में ज्वाला और उसके शावक नदी के आसपास विचरण कर रहे हैं। ज्वाला राजस्थान की सीमा तक भी जा चुकी है। वह भी चंबल नदी को पार कर वहां तक पहुंची थी।
कूनो अभयारण्य के बीच से गुजरने वाली कूनो नदी 200 मीटर चौड़ी है। गर्मियों के दिनों में नदी में अधिकतर स्थानों पर बड़े-बड़े पत्थर होने के कारण बहाव कम रहता है, इसलिए पैदल भी इसे पार किया जा सकता है, परंतु वर्षाकाल में पानी का बहाव तेज रहता है। कूनो से दो चीते गांधीसागर अभयारण्य में भी भेजे गए हैं, वहां चंबल नदी ज्यादा चौड़ी है। ऐसे में वहां भी चीते नदी में तैरकर पार करने का प्रयास कर सकते हैं। चंबल में मौजूद जलीय जीवों से उन्हें खतरा भी हो सकता है लेकिन प्राकृतिक वातावरण में ये घटनाएं सामान्य मानी जाती हैं।
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सिंह परियोजना के निदेशक उत्तम शर्मा का कहना है कि यहां अफ्रीका से लाकर चीते बसाए गए हैं। अफ्रीका में चीतों को आमतौर पर पानी से दूरी बनाकर रखते ही देखा जाता है। चीते अन्य वन्य जीवों की तरह बेखौफ होकर पानी में छलांग भी नहीं लगाते। हालांकि कूनो में लगातार ही चीते नदी पार करते रहे हैं, जब नदी में तेज बहाव था, तब भी नदी पार कर जाते हैं। वे नदियों के पास सहज नजर आ रहे हैं। यह बदलाव प्रकृति के साथ अनुकूलन की वजह से भी हो सकता है जो कि अच्छा संकेत है।