
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। महाकौशल की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संस्था नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज-अस्पताल की नई बिल्डिंग का सपना कागजों में ही अटका है।
करीब 13 सौ करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले तीन हजार से अधिक बेड के नए अस्पताल की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) पिछले छह महीने से फाइनल नहीं हो पा रही है।
इधर पुरानी बिल्डिंग जर्जर हो चुकी है, छत से प्लास्टर गिर रहा है, दीवारों में सीलन है। ऐसे में रोजाना आने वाले मरीजों का इलाज कैसे हो, इसे लेकर मेडिकल प्रशासन चिंतित है। जगह की कमी के कारण शिफ्टिंग भी अधर में है।
क्यों अटकी डीपीआर?
कॉलेज प्रबंधन ने बताया कि नई बिल्डिंग के लिए लोक निर्माण विभाग ने दो बार डीपीआर बनाई, लेकिन शासन स्तर पर आपत्ति लग गई। पहली डीपीआर में पार्किंग और फायर सेफ्टी के मानक पूरे नहीं थे, दूसरी में लागत 1300 करोड़ आंकी गई। अब तीसरी बार संशोधन के लिए फाइल भोपाल में स्वास्थ्य चिकित्सा शिक्षा संचालनालय में लंबित है।
जर्जर भवन, बढ़ता खतरा
साल 1955 में बना मेडिकल कॉलेज का मुख्य भवन अब खस्ताहाल हो गया है। सर्जरी वार्ड नंबर चार और पांच में पिछले माह छत का हिस्सा गिर गया था, गनीमत रही कि कोई हताहत नहीं हुआ। मानसून में आठ वार्डों में पानी टपकता है, मरीजों को बेड बदलना पड़ता है। इलेक्ट्रिक वायरिंग 30 साल पुरानी है, कई बार शॉर्ट सर्किट हो चुका है। पीडब्ल्यूडी ने खुद भवन को 'अति जर्जर' घोषित कर मरम्मत की बजाय नया निर्माण सुझाया है।
जर्जर भवन में लगाई जा रही लोहे की गर्डर
मेडिकल कॉलेज को नया भवन मिलने का इंतजार लंबा होता जा रहा है। प्रस्तावित नए मेडिकल कॉलेज भवन और अत्याधुनिक अस्पताल की डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) पर अब भी मंथन जारी है।
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शासन स्तर से स्वीकृति, बजट आवंटन और टेंडर प्रक्रिया में हो रही देरी के कारण परियोजना कागजों से बाहर नहीं निकल पा रही है।
वहीं, दूसरी ओर दशकों पुराने जर्जर अस्पताल भवन को ढहने से बचाने के लिए अब लोहे की गर्डर लगाकर उसे सहारा दिया जा रहा है। गौरतलब है कि मेडिकल कॉलेज का मुख्य अस्पताल भवन 70 साल से अधिक पुराना है। इसकी दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं, छतों से प्लास्टर गिर रहा है और बारिश में कई वार्डों में पानी टपकता है।
मरीजों और स्टाफ की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने अब अस्थायी उपाय के तौर पर कमजोर हिस्सों में लोहे की गर्डर और सपोर्ट लगाना शुरू किया है।
वार्ड के कई पिलर कमजोर हो चुके
अस्पताल सूत्रों के अनुसार, मेडिसिन, सर्जरी और आर्थोपेडिक वार्ड के कई पिलर कमजोर हो चुके हैं। छत का लोड बढ़ने से हादसे का खतरा बना रहता है। ऐसे में गर्डर लगाकर भवन को अस्थायी मजबूती दी जा रही है, लेकिन चिकित्सकों का कहना है कि यह स्थायी समाधान नहीं है।
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डिजाइन को लेकर बदलाव सामने आ रहे
दूसरी ओर, नए भवन को लेकर मेडिकल कालेज प्रबंधन ने शासन को प्रस्ताव भेजा था। प्रस्ताव के अनुसार, मौजूदा परिसर में ही नए एकीकृत भवन का निर्माण होना है, जिसमें सभी विभाग, आधुनिक ओटी, आइसीयू, कैजुअल्टी और रिसर्च लैब एक ही छत के नीचे होंगे।
लेकिन डीपीआर में लागत, डिजाइन और जमीन के उपयोग को लेकर तकनीकी आपत्तियां लग रही हैं। कभी लागत 800 करोड़ से बढ़कर 13 सौ करोड़ बताई जाती है, तो कभी डिजाइन में बदलाव की बात सामने आती है।
नए डिजाइन के अनुरूप कालेज अस्पताल भवन नौ मंजिला होगा और पार्किंग बेसमेंट में होगी। एक ही छत के लिए सारी अत्याधुनिक सुविधाएं मरीजों को मिलेगी। एक बड़ा प्रोजेक्ट आकार लेने जा रहा है। जल्द ही इस दिशा में कार्य आरंभ होगा। डॉक्टर, नवनीत सक्सेना, डीन, मेडिकल कॉलेज
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