
सुरेन्द्र दुबे, जबलपुर। पूर्णचंद्र की चांदनी जब धरती पर उतरती है, तो रात केवल रात नहीं रह जाती। शरद की धवल चांदनी में आस्था का उजास घुलता है, खीर में अमृतत्व की कल्पना आकार लेती है और श्रीकृष्ण के महारास की स्मृति से वृंदावन का भावलोक सजीव हो उठता है।
इसे शरद पूर्णिमा कहें, कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा, भारतीय संस्कृति में यह तिथि प्रकृति, प्रेम, आरोग्य और अध्यात्म के अद्भुत समन्वय का पर्व है। लेकिन संस्कारधानी जबलपुर के लिए शरद पूर्णिमा का अर्थ केवल चंद्रमा की सोलह कलाओं की पूर्णता और लक्ष्मी पूजन तक सीमित नहीं है।
इस पर्व के साथ यहां का इतिहास भी चांदनी की तरह दमकता है। रानी दुर्गावती के शासनकाल में राजकीय उत्सव के रूप में आरंभ हुई परंपरा ने गढ़ा को वैष्णव भक्ति का ऐसा केंद्र बनाया, जिसकी स्मृति में आज भी लघु काशी-वृंदावन की सांस्कृतिक छवि दिखाई देती है।

प्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ. आनंद सिंह राणा के अनुसार, जबलपुर का गढ़ा-कटंगा साम्राज्य रानी दुर्गावती के शासनकाल में वैभव और गौरव के शिखर पर पहुंचा। इसी कालखंड में वर्ष 1563 में महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुत्र स्वामी विट्ठलनाथ के प्रयासों से शरद पूर्णिमा को राजकीय उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा आरंभ हुई।
उस समय गढ़ा ही इस क्षेत्र का प्रमुख नगरीय केंद्र था। रानी दुर्गावती के आमंत्रण और संरक्षण में स्वामी विट्ठलनाथ का यहां आगमन हुआ और उनके प्रवास ने इस क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा दी। स्वामी विट्ठलनाथ वैष्णव भक्ति परंपरा के प्रमुख आचार्य थे।
उन्होंने शुद्धाद्वैत दर्शन और पुष्टिमार्गीय भक्ति की परंपरा को आगे बढ़ाया। गढ़ा में शरद पूर्णिमा के उत्सव का आरंभ इसी वैष्णव भावभूमि से जुड़ा था। उत्तर भारत में मुगल सत्ता के विस्तार के दौर में गढ़ा में इस प्रकार का राजकीय धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन अपने आप में विशिष्ट महत्व रखता था।
रानी दुर्गावती की उदार सांस्कृतिक दृष्टि और स्वामी विट्ठलनाथ की आध्यात्मिक परंपरा के मेल ने गढ़ा को विशिष्ट पहचान दी। पचमठा मंदिर सहित क्षेत्र की ऐतिहासिक धार्मिक विरासत इसी व्यापक सांस्कृतिक प्रवाह की स्मृति संजोए हुए है।
इस दृष्टि से शरद पूर्णिमा जबलपुर की सांस्कृतिक स्मृति का वह अध्याय है, जिसमें राजसत्ता, संत परंपरा और लोक आस्था एक साथ दिखाई देते हैं। गढ़ा का लघु काशी-वृंदावन के रूप में स्मरण इसी विरासत की ओर संकेत करता है।

शरद पूर्णिमा का एक लोकप्रिय नाम कोजागरी पूर्णिमा है। लोकमान्यता के अनुसार, इस रात महालक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और पूछती हैं-को जागर्ति, अर्थात कौन जाग रहा है। यह प्रश्न केवल रातभर जागने का नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य, कर्म और चेतना के प्रति सजग रहने का भी प्रतीक माना जा सकता है।
भारतीय लोकजीवन ने इस मान्यता को धन-धान्य, समृद्धि और श्रम के सम्मान से जोड़ दिया है। इसी रात चंद्रमा की उजली आभा को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणों में अमृततुल्य गुण होते हैं।
इसलिए घरों की छतों और आंगनों में खीर रखी जाती है। रातभर चांदनी में रखी खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। इस विश्वास में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, ऋतु परिवर्तन की अनुभूति और सामूहिक पारिवारिक उल्लास भी समाहित है।
आयुर्वेद की पारंपरिक मान्यताओं में चंद्रमा, औषधियों और आरोग्य के बीच संबंध बताया गया है। वेद-पुराणों में चंद्रमा को मन और औषधियों से जोड़कर देखा गया है। हालांकि चांदनी में रखी खीर से सभी रोग दूर होने का दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है, लेकिन भारतीय लोकसंस्कृति में इस परंपरा का भावनात्मक और धार्मिक महत्व निर्विवाद है।

शरद पूर्णिमा 25 को मनेगी 26 को उदय तिथि में होगा स्नान दान
शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण और राधा के महारास की कथा इस पर्व को प्रेम, समर्पण और आध्यात्मिक आनंद का उत्सव बनाती है। मान्यता है कि वृंदावन में शरद पूर्णिमा की रात श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया।
चंद्रमा की शीतल आभा, यमुना का तट और वृंदावन की कुंजों में गूंजती बांसुरी भारतीय काव्य, संगीत, चित्रकला और भक्ति साहित्य के शाश्वत प्रतीक बन गए। महारास का भाव केवल नृत्य और उत्सव तक सीमित नहीं है।
भक्ति परंपरा में इसे जीवात्मा और परमात्मा के मिलन, अहंकार के विसर्जन तथा प्रेम की सर्वोच्च अनुभूति के रूप में देखा गया है। शायद यही कारण है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी में वृंदावन की स्मृति देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूपों में जीवित दिखाई देती है।
गुजरात में रास और गरबा, मणिपुर में वैष्णव रासलीला तथा पश्चिम बंगाल और ओडिशा में महालक्ष्मी की पूजा इस पर्व की व्यापक सांस्कृतिक स्वीकार्यता को दर्शाती है। ओडिशा में इसे कुमार पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
वहां कुंवारी कन्याएं सुंदर और योग्य जीवनसाथी की कामना के साथ परंपरागत अनुष्ठान करती हैं। इस प्रकार एक ही पूर्णिमा देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग लोकविश्वासों, कलाओं और पारिवारिक परंपराओं का आधार बनती है।

शरद पूर्णिमा का एक सामाजिक पक्ष भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परंपरा में पूर्ण चंद्रमा की स्वच्छ, श्वेत और निर्मल आभा को समाज में जागरण, संगठन और सकारात्मक परिवर्तन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। चंद्रमा की अमृत वर्षा की कल्पना समाज में सद्भाव, सहयोग और उत्साह के प्रसार से जोड़ी जाती है।
इस प्रकार प्रकृति का एक खगोलीय दृश्य सामूहिक चेतना का संदेश बन जाता है। वर्षा ऋतु की विदाई और शरद के आगमन के बीच पड़ने वाली यह पूर्णिमा ऋतु परिवर्तन का भी संकेत देती है।
इसी के बाद कार्तिक मास के स्नान, दीपदान, तुलसी सेवा और भगवान विष्णु की आराधना से जुड़ी परंपराएं गति पकड़ती हैं। घर-आंगन में खीर, मंदिरों में भजन, रासलीला और चंद्रमा के दर्शन मिलकर इस पर्व को जनजीवन का उत्सव बनाते हैं।
इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 55 मिनट से प्रारंभ होकर 26 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 41 मिनट तक रहेगी। तिथि के इस कालखंड में पूजा और व्रत का समय निर्धारित करने के लिए स्थानीय पंचांग तथा परंपरा के अनुसार निर्णय लेना उचित होगा।
जबलपुर के लिए इस शरद पूर्णिमा का संदेश अपनी ऐतिहासिक विरासत को नए सिरे से पहचानने का भी है। जिस गढ़ा की धरती पर रानी दुर्गावती के संरक्षण और स्वामी विट्ठलनाथ की वैष्णव परंपरा ने शरद पूर्णिमा को राजकीय उत्सव का स्वरूप दिया, वही गढ़ा आज संस्कारधानी की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चांदनी हर वर्ष लौटती है, खीर की मिठास हर आंगन में घुलती है और श्रीकृष्ण के महारास की कथा फिर सुनाई देती है।
लेकिन इस उजास के साथ इतिहास की स्मृति भी जागे, तो शरद पूर्णिमा केवल पर्व नहीं, जबलपुर की सांस्कृतिक अस्मिता का उत्सव बन जाती है। गढ़ा की चांदनी में आज भी इतिहास, भक्ति और लोकजीवन एक साथ मुस्कराते हैं। यही वह उजास है, जिसने संस्कारधानी को लघु काशी-वृंदावन की आत्मीय पहचान दी।